Friday, 31 May 2013

01.06.13


एक जंगल में एक भयंकर सर्प रहता था। उसके आतंक के कारन कोई वहां से नहीं जाता था। एक दिन एक ऋषि उस रस्ते से गुजर रहे थे। उनको देखकर सर्प लपका और काटना चाहा, परन्तु ऋषि ने योग बल से उसपर विजय पा ली।सर्प शरणागत होकर बोला - क्षमा करिए ऋषिवर, मैं आपकी शरण में हूँ। ऋषि ने उसे क्षमा कर दिया, और कहा कि आज से तू किसी को नहीं काटेगा। सर्प मान गया। ऋषि चले गए। उनके जाने के बाद सर्प ने लोगों को काटना बंद कर दिया। किसी को वह नहीं काटता था और धीरे-धीरे जंगल का रास्ता खुल गया। लोग आने-जाने लगे। सर्प लोगों को देखकर मार्ग से हट जाता। चरवाहे लड़के वहां आने लगे। वह सर्प को देखते ही पत्थर मरने लगे। सर्प भागकर बिल में चला जाता था। वह मार खाते-खाते दुबला और घायल हो गया था। बहुत समय बाद मुनि उस रास्ते से गुजरे। सर्प ने प्रणाम किया और अपनी व्यथा बताई। मुनि बोले - मुर्ख मैंने काटने से मना किया था, फुफकारने के लिए नहीं। मुनिवर समझाकर चले गए। सर्प समझ गया। चरवाहे लड़के पत्थर मारने वाले ही थे, कि वह फुफकार उठा। लड़के घबराकर भाग गए। तब से उसे किसी ने पत्थर नहीं मारा।
मनुष्य को अकारण किसी पर आक्रमण नहीं करना चाहिए, परन्तु इतना डरपोक भी नहीं होना चाहिए कि कोई भी उसपर आक्रमण करने की हिम्मत कर सके। इसलिए अपना रोबीला अस्तित्व बनाये रखें, ताकि कोई भी आपकी ओर आँख उठाकर नहीं देख सके।

Thursday, 30 May 2013

31.05.13


~एक सदना नाम का कसाई था,मांस बेचता था, पर भगवत भजन में बड़ी निष्ठा थी, एक दिन एक नदी के किनारे से जा रहा था, रास्ते में एक पत्थर पड़ा मिल गया....उसे अच्छा लगा उसने सोचा बड़ा अच्छा पत्थर है क्यों ना मैँ इसे मांस तौलने के लिए उपयोग करू. उसे उठाकर ले आया....और मांस तौलने में प्रयोग करने लगा.
जब एक किलो तौलता तो भी सही तुल जाता, जब दो किलो तौलता तब भी सही तुल जाता, इस प्रकार चाहे जितना भी तौलता हर भार एक दम सही तुल जाता, अब तो एक ही पत्थर से सभी माप करता और अपने काम को करता जाता और भगवन नाम लेता जाता.
एक दिन की बात है उसी दुकान के सामने से एक ब्राह्मण निकले ब्राह्मण बड़े ज्ञानी विद्वान थे, उनकी नजर जब उस पत्थर पर पड़ी तो वे तुरंत उस सदना के पास आये और गुस्से में बोले ये तुम क्या कर रहे हो क्या तुम जानते नहीं जिसे पत्थर समझकर तुम तौलने में प्रयोग कर रहे हो वे शालिग्राम भगवान है, इसे मुझे दो जब सदना ने यह सुना तो उसे बड़ा दुःख हुआ और वह बोला हे ब्राह्मण देव मुझे पता नहीं था कि ये भगवान है मुझे क्षमा कर दीजिये.और शालिग्राम भगवान को उसने ब्राह्मण को दे दिया....
ब्राह्मण शालिग्राम शिला को लेकर अपने घर आ गए और गंगा जल से उन्हें नहलाकर, मखमलके बिस्तर पर, सिंहासन पर बैठा दिया, और धूप, दीप,चन्दन से पूजा की. जब रात हुई और वह ब्राह्मण सोया तो सपने में भगवान आये और बोले ब्राह्मण मुझे तुम जहाँ से लाए हो वहीँ छोड आओं मुझे यहाँ अच्छा नहीं लग रहा. इस पर ब्राह्मण बोला भगवान ! वो कसाई तो आपको तुला में रखता था जहाँ दूसरी ओर मास तौलता था उस अपवित्र जगह में आप थे.
भगवान बोले - ब्राहमण आप नहीं जानते जब सदना मुझे तराजू में तौलता था तो मानो हर पल मुझे अपने हाथो से झूला झूला रहा हो जब वह अपना काम करता था तो हर पल मेरे नाम का उच्चारण करता था.हर पल मेरा भजन करता था जो आनन्द मुझे वहाँ मिलता था वो आनंद यहाँ नहीं.इसलिए आप मुझे वही छोड आये.तब ब्राह्मण तुरंत उस सदना कसाई के पास गया ओर बोला मुझे माफ कर दीजिए.वास्तव में तो आप ही सच्ची भक्ति करते है.ये अपने भगवान को संभालिए......।।।~


♥~जय श्री राधे कृष्ण.....।।।~♥

Wednesday, 29 May 2013

30.05.13


एक बार एक यज्ञ मे नारद जी ने सत्यभामा जी से दान-स्वरुप भगवान श्री कृष्ण को ही माँग लिया !
बड़ी दुविधा पैदा हो गई क्योकि सत्यभामा जी से भगवान श्री कृष्ण के जुदा होने का मतलब था देह से प्राणो का जुदा होना !काफी सोच-विचार के बाद तय किया गया कि भगवान की जगह उनके तुल्य स्वर्ण ही दे दिया जाय !अब एक पलड़े मे प्रभु बैठे और दूसरे मे स्वर्ण रखा जाने लगा लेकिन यह क्या ?स्वर्ण का तो पहाड़ खड़ा कर दिया गया परन्तु भगवान का पलड़ा ज्यो का त्यो धरती से लगा रहा ;जरा भी ना उठा !
जब सारे प्रयास असफल हो गये तो श्री कृष्ण की दूसरी रानी रुक्मिणी जी ने प्रभु के नाम सुमिरन का आसरा लिया !एक तुलसी पत्र लिया और सुमिरन करके स्वर्ण वाले पलड़े मे रख दिया !बस उसी क्षण चमत्कार घटा ;दोनो पलड़े बराबर हो गये !
इस संसार मे प्रभु के बराबर कोई है तो वह है स्वयं उनका नाम !वास्तव मे नाम और नामी दोनो मे कोई भिन्नता नही है !वस्तुतः दोनो एक ही तत्व है

Tuesday, 28 May 2013

29.05.13


एक दिन यमदुत एक इन्सान के प्राण हरण करने आया, तो उस इन्सान ने कहा: मुझे आप के साथ आना पङेगा?
यमदुत: बिल्कुल
इन्सान: क्योँ?
यमदुत: मेरे पास एक लिस्ट है,उसमे
तेरा नाम सबसे ऊपर है ईसिलिए तुझे मेरे
साथ चलना पङेगा।
इन्सान: चलो अच्छा लेकिन मेरी एक
ईच्छा हे कि हम यहा दोनो साथ मे
खाना खाकर जायेँगेँ।
यमदुत: ठीक है।
( वो इन्सान यमदुत से नजर चुराकर खाने मेँ नीदं की गोलीया मिला देता है।)
खाना खाने के बाद यमदुत को जोरदार नीँद आती है और वो वही सो जाता है,
वो इन्सान मौके का फायदा उठाकर
लिस्ट मेँ से अपना नाम उपर से काटकर
सबसे नीचे लिख देता है।
जब यमदुत नीँद से उठता हे तो कहता है, हे
मानव ! तेरा खाना बहुत स्वादिष्ट था।
मैँ तुझसे खुश हु।
अब मैँ पहले तुझे नही लिस्ट मेँ सबसे नीचे
वाले से जाने की शुरुआत करुंगा।
Moral- मौत को कोई नही टाल सकता,
विधि का जो लेख है वो होकर ही रहेगा..

Monday, 27 May 2013

28 05.13


*. मेहनत करने से दरिद्रता नहीं रहती, धर्म करने से पाप नहीं रहता, मौन रहने से कलह नहीं होता और जागते रहने से भय नहीं होता।

*. आँख के अंधे को दुनिया नहीं दिखती, काम के अंधे को विवेक नहीं दिखता, मद के अंधे को अपने से श्रेष्ठ नहीं दिखता और स्वार्थी को कहीं भी दोष नहीं दिखता।

*. प्रलय होने पर समुद्र भी अपनी मर्यादा को छोड़ देते हैं लेकिन सज्जन लोग महाविपत्ति में भी मर्यादा को नहीं छोड़ते।
...
*. तृण से हल्की रूई होती है और रूई से भी हल्का याचक।हवा इस डर से उसे नहीं उड़ाती कि कहीं उससे भी कुछ न माँग ले।

*. धन के लोभी के पास सच्चाई नहीं रहती और व्यभिचारी के पास पवित्रता नहीं रहती।

*. पुरुषार्थ से दरिद्रता का नाश होता है, जप से पाप दूर होता है, मौन से कलह की उत्पत्ति नहीं होती और सजगता से भय नहीं होता।

*. प्रजा के सुख में ही राजाका सुख और प्रजाओं के हित में ही राजा को अपना हित समझना चाहिए। आत्मप्रियता में राजा का हित नहीं है, प्रजाओं की प्रियता में ही राजा का हित है।

*. मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु उसका अज्ञान है।

*. कुबेर भी यदि आय से अधिक व्यय करे तो निर्धन हो जाता है।

*. आपदर्थे धनं रक्षेद दारान रक्षेद धनैरपि! आत्मान सतत रक्षेद दारैरपि धनैरपि! (विपत्तिके समय काम आने वाले धन की रक्षा करें। धन से स्त्री की रक्षा करें ।) 

Sunday, 26 May 2013

27.05.13


मजदूर के जूते...

एक बार एक शिक्षक संपन्न परिवार से सम्बन्ध रखने वाले एक युवा शिष्य के साथ कहीं टहलने निकले . उन्होंने देखा की रास्ते में पुराने हो चुके एक जोड़ी जूते उतरे पड़े हैं , जो संभवतः पास के खेत में काम कर रहे गरीब मजदूर के थे जो अब अपना काम ख़त्म कर घर वापस जाने की तयारी कर रहा था .

शिष्य को मजाक सूझा उसने शिक्षक से कहा , “ गुरु जी क्यों न हम ये जूते कहीं छिपा कर झाड़ियों के पीछे छिप जाएं ; जब वो मजदूर इन्हें यहाँ नहीं पाकर घबराएगा तो बड़ा मजा आएगा !!”

शिक्षक गंभीरता से बोले , “ किसी गरीब के साथ इस तरह का भद्दा मजाक करना ठीक नहीं है . क्यों ना हम इन जूतों में कुछ सिक्के डाल दें और छिप कर देखें की इसका मजदूर पर क्या प्रभाव पड़ता है !!”

शिष्य ने ऐसा ही किया और दोनों पास की झाड़ियों में छुप गए .

मजदूर जल्द ही अपना काम ख़त्म कर जूतों की जगह पर आ गया . उसने जैसे ही एक पैर जूते में डाले उसे किसी कठोर चीज का आभास हुआ , उसने जल्दी से जूते हाथ में लिए और देखा की अन्दर कुछ सिक्के पड़े थे , उसे बड़ा आश्चर्य हुआ और वो सिक्के हाथ में लेकर बड़े गौर से उन्हें पलट -पलट कर देखने लगा . फिर उसने इधर -उधर देखने लगा , दूर -दूर तक कोई नज़र नहीं आया तो उसने सिक्के अपनी जेब में डाल लिए . अब उसने दूसरा जूता उठाया , उसमे भी सिक्के पड़े थे …मजदूर भावविभोर हो गया , उसकी आँखों में आंसू आ गए , उसने हाथ जोड़ ऊपर देखते हुए कहा – “हे भगवान् , समय पर प्राप्त इस सहायता के लिए उस अनजान सहायक का लाख -लाख धन्यवाद , उसकी सहायता और दयालुता के कारण आज मेरी बीमार पत्नी को दावा और भूखें बच्चों को रोटी मिल सकेगी .”

मजदूर की बातें सुन शिष्य की आँखें भर आयीं . शिक्षक ने शिष्य से कहा – “ क्या तुम्हारी मजाक वाली बात की अपेक्षा जूते में सिक्का डालने से तुम्हे कम ख़ुशी मिली ?”

शिष्य बोला , “ आपने आज मुझे जो पाठ पढाया है , उसे मैं जीवन भर नहीं भूलूंगा . आज मैं उन शब्दों का मतलब समझ गया हूँ जिन्हें मैं पहले कभी नहीं समझ पाया था कि लेने की अपेक्षा देना कहीं अधिक आनंददायी है . देने का आनंद असीम है . देना देवत्त है

Saturday, 25 May 2013

26.05.13


अनकहे अनजाने सच.....

बहुत पुरानी बात है। एक गाँव में युधिष्ठिर नाम का एक कुम्हार रहता था। उसे शराब पीने की बहुत बुरी लत थी। एक दिन शराब के नशे में लडखड़ाकर वह एक टूटे बर्तन पर गिर पड़ा। टूटे हुए बर्तन का तीखा कोना उसके माथे में जा घुसा और भलभलाकर खून बहने लगा। लेकिन कुम्हार ने घाव की कोई परवाह नहीं की और जिसका घाव बिगड़ गया। कुछ समय बाद घाव तो भर गया लेकिन माथे पर एक बड़ा निशान पड़ गया।
कुछ समय बाद इलाके में अकाल पड़ गया कुम्हार का काम भी ठप पड़ गया। अतः वह रोजगार की तलाश में दूसरे देश की ओर चल दिया। वहाँ पहुंचकर उसने किसी प्रकार वहां के राजा के पास नौकरी पा ली।
एक बार जब राजा ने उसके माथे पर पड़ा निशान देखा तो उसने सोचा कि वह बहुत बहादुर होगा। शायद शत्रु सेना के किसी सिपाही के साथ युद्ध करते समय इसके माथे पर घाव लगा होगा। अतः राजा ने उसे अपने चुने हुए सेनापतियों के साथ नियुक्त कर दिया।

एक बार जब पड़ोसी देश के साथ युद्ध के आसार बनने लगे तो राजा ने अपने सेनापतियों का उत्साह बढ़ाने के लिए उन्हें सम्मानित किया।
कुछ समय बाद उसने कुम्हार को अपनी सेना का सर्वोच्च सेनापति बनाने का निर्णय लिया। उसने कुम्हार से पूछा-‘‘वीर युवक ! तुम्हारा नाम क्या है ? तुम्हारे माथे पर यह निशान कैसे पड़ा ? उस युद्ध का क्या नाम है था, जिसमें तुमने भाग लिया था ?’’

‘‘महाराज !’’ कुम्हार बोला-‘‘पेशे से मैं कुम्हार हूं। एक बार मैं शराब पीकर टूटे हुए कांच पर गिर पड़ा था। कांच मेरे माथे में घुस गया था और निशान उसी घाव का है, जो कांच घुसने से बना था।’’

यह सुनकर राजा आग बबूला हो उठा। उसने उस कुम्हार को सेना तथा देश से बाहर निकालने का आदेश दे दिया।
राजा के पैर पकड़कर कुम्हार बहुत गिड़गिड़ाया। अनेक दलीलें दीं कि वह उसे अपनी सेना में बना रहने दे। सेना में रहकर युद्ध के समय उसे जौहर दिखाने का मौका दे, लेकिन राजा ने उसकी एक न सुनी और उसे देश से बाहर कर दिया।
अब कुम्हार बिचारा सोच रहा था कि क्या सच बोलने का अंजाम ऐसा भी हो सकता है..