Tuesday, 14 May 2013

15.05.13


●● ☆ ●● ☆●● ☆ ●● ☆●● ☆ ●● ☆●● ☆ ●● ☆ ●● ☆ ●● ☆
मीरा के प्रभु , गिरधर गोपाल ! दुसरो न कोई .
●● ☆ ●● ☆●● ☆ ●

● ☆●● ☆ ●● ☆●● ☆ ●● ☆ ●● ☆ ●● ☆
संत मीरा बाई अपने
कुछ भक्त के साथ हरि नाम संकीर्तन करते हुए अपने
कान्हा के धाम वृंदावन जा रही थीं ,

एक दिन संध्या हो चला था ,
उनके एक भक्त ने कहा
“ माँ, अब हमें आगे नहीं जाना चाहिए हमारे साथ भक्त की टोली में बच्चे और स्त्री साधक अनेक हैं , आगे घना जंगल है , हम आसपास यहीं कहीं रात्री काट लेते हैं “|

संत मीरा बाई ने
भी हामी भर दी और कहा की पूरी टोली के लिए कोई आसरा देखो |

एक भक्त ने कहा
“ कुछ ही दूरी पर एक संत का बड़ा आश्रम है हम सब वहीं रुक जाएगे |

माँ ने हामी भर दी |

पूरी टोली उस आश्रम पहुंची | आश्रम का एक सेवक द्वार पर खड़ा था ,

मीराबाई ने कहा
“ क्या मुझे और मेरी भक्त की टोली को रात्रि निवास के लिए स्थान मिलेगा ?”

सेवक ने कहा
“ मैं स्वामीजी से
पूछ कर बताता हूँ “ |

सेवक ने स्वामीजी से मिलने के पश्चात आकर बोला
“ स्वामीजी ने
कहा है इस आश्रम में मात्र पुरुष ही रुक सकते हैं ,
यहाँ सब ब्रह्मचारी रहते हैं “|

मीरा बाई ने पंक्ति लिखकर उस सेवक को पकड़ा दी और कहा
“अपने स्वामीजी को देकर आयें “ |

स्वामीजी ने जैसे ही उस पंक्ति को पढ़ा वे दौड़ कर आए और मीरबाई के चरणों में गिर पड़े और कहा
“ माँ, हमे क्षमा करना, हम आपको पहचान नहीं पाये |

“ मीराबाई ने जो एक पंक्ति लिखकर भेजी थी वह इस प्रकार थी

“ मुझे लगा था कि इस संसार में एक ही पुरुष है-
श्री कृष्ण और शेष सभी नारी ,
आज पता चला कि दो पुरुष हैं !!!

जय श्री कृष्ण “ |
●● ☆ ●● ☆●● ☆ ●● ☆●● ☆ ●● ☆●● ☆ ●● ☆ ●● ☆ ●● ☆
जय जय श्री राधे-श्याम
●● ☆ ●● ☆●● ☆ ●● ☆●● ☆ ●● ☆●● ☆ ●● ☆

Monday, 13 May 2013

14.05.13


एक साधु बहुत बूढ़े हो गए थे। उनके जीवन का आखिरी क्षण आ पहुँचा। आखिरी क्षणों में उन्होंने अपने शिष्यों और चेलों को पास बुलाया। जब सब उनके पास आ गए, तब उन्होंने अपना पोपला मुँह पूरा खोल दिया और शिष्यों से बोले-'देखो, मेरे मुँह में कितने दाँत बच गए हैं?' शिष्यों ने उनके मुँह की ओर देखा।

कुछ टटोलते हुए वे लगभग एक स्वर में बोल उठे-'महाराज आपका तो एक भीदाँत शेष नहीं बचा। शायद कई वर्षों से आपका एक भी दाँत नहीं है।' साधु बोले-'देखो, मेरी जीभ तो बची हुई है।'

सबने उत्तर दिया-'हाँ, आपकी जीभ अवश्य बची हुई है।' इस पर सबने कहा-'पर यह हुआ कैसे?' मेरे जन्म के समय जीभ थी और आज मैं यह चोला छोड़ रहा हूँ तो भी यह जीभ बची हुईहै। ये दाँत पीछे पैदा हुए, ये जीभसे पहले कैसे विदा हो गए? इसका क्या कारण है, कभी सोचा?'

शिष्यों ने उत्तर दिया-'हमें मालूम नहीं। महाराज, आप ही बतलाइए।'

उस समय मृदु आवाज में संत ने समझाया- 'यही रहस्य बताने के लिए मैंने तुम सबको इस बेला में बुलाया है। इस जीभ में माधुर्य था, मृदुता थी और खुद भी कोमल थी, इसलिए वह आज भी मेरे पास है परंतु.......मेरे दाँतों में शुरू से ही कठोरता थी, इसलिए वे पीछे आकर भी पहले खत्म हो गए, अपनी कठोरता के कारण ही ये दीर्घजीवी नहीं हो सके।

दीर्घजीवी होना चाहते हो तो कठोरता छोड़ो और विनम्रता सीखो।'

Sunday, 12 May 2013

13.05.13


 दीवार को उधेड़ रहा तो उसने
देखा कि वहां दीवार में एक
छिपकली फंसी हुई थी।
छिपकली के एक पैरमें कील
ठुकी हुईथी। उसने यह देखा और उसे छिपकली पर रहम आया। उसने
इस मामले में उत्सुकता दिखाई
और गौर से उस छिपकली के पैर में
ठुकी कील को देखा। अरे यह
क्या! यह तो वही कील है जो दस
साल पहले मकान बनाते वक्त ठोकी गई थी। यह क्या !!!!
क्यायह छिपकली पिछले दस
सालों से इसी हालत से दो चार
है? दीवार के अंधेरे हिस्से में
बिना हिले-डुले पिछले दस
सालों से!! यह नामुमकिन है। मेरा दिमाग
इसको गवारा नहीं कर रहा। उसे
हैरत हुई।यह छिपकली पिछले दस
सालों से आखिरजिंदा कैसे है!!!
बिना एक कदम हिले-डुले
जबकि इसके पैर में कील ठुकी है! उसने अपना काम रोक दिया और
उस छिपकली को गौर से देखने
लगा। आखिर यह अब तक कैसे रह
पाई औरक्या और किस तरह
की खुराक इसे अब तक मिल पाई।
इस बीच एक दूसरी छिपकली ना जाने
कहां से वहां आई जिसके मुंह में
खुराक थी।
अरे!!!!! यह देखकर वह अंदर तक हिल
गया। यह दूसरी छिपकली पिछले
दस सालों से इस फंसी हुई छिपकली को खिलाती रही।
जरा गौर कीजिए वह
दूसरी छिपकली बिना थके और
अपने साथी की उम्मीद छोड़े
बिना लगातार दस साल से उसे
खिलाती रही।आप अपने गिरेबां में झांकिए क्या आप
अपने जीवनसाथी के लिए

ऐसी कोशिश कर सकते हैं?
सोचिए क्या तुम अपनी मां के
लिए ऐसा कर सकते हो जो तुम्हें
नौ माह तक परेशानीपर परेशानी उठाते हुए अपनी कोख
में लिए-लिए फिरती है?
और कम से कम अपने पिता के लिए,
अपने भाई- बहिनों के लिए
या फिर अपने दोस्त के लिए?

गौर और फिक्र कीजिए अगर एक छोटा सा जीव ऐसा कर
सकता है तो वह जीव
क्यों नहीं जिसको ईश्वर ने सबसे
ज्यादा अक्लमंद बनाया है..

Saturday, 11 May 2013

12.05.13


पंडित जी ने सोचा कि थोड़ी देर बाद कंडक्टर को रुपये वापस कर दूँगा

कुछ देर बाद मन मे विचार आया की बेवजह दस रुपये जैसी मामूली रकम को लेकर परेशान हो रहे है आखिर ये बस कंपनी वाले भी तो लाखों कमाते है बेहतर है इन रूपयो को भगवान की भेंट समझकर अपने पास ही रख लिया जाए वह इनका सदुपयोग ही करेंगे

मन मे चल रहे विचार के बीच उनका गंतव्य स्थल आ गया बस मे उतरते ही उनके कदम अचानक ठिठके उन्होंने जेब मे हाथ डाला और दस का नोट निकाल कर कंडक्टर को देते हुए कहा भाई तुमने मुझे किराए के रुपये काटने के बाद भी दस रुपये ज्यादा दे दिए थे

कंडक्टर मुस्कराते हुए बोला क्या आप ही गाँव के मंदिर के नए पुजारी हो?

पंडित जी को हामी भरने पर कंडक्टर बोला मेरे मन मे कई दिनों से आपके प्रवचन सुनने की इच्छा है आपको बस मे देखातो ख्याल आया कि चलो देखते है कि मैं ज्यादा पैसे लौटाऊँ तो आप क्या करते हो अब मुझे पता चल गया की आपके प्रवचन जैसा ही आपका आचरण है जिससे सभी को सिख लेनी चाहिए

ये बोलकर कंडक्टर ने गाड़ी आगे बड़ा दी

पंडित जी बस से उतरकर पसीना पसीना थे उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर भगवान से कहा है प्रभु तेरा लाख लाख शुक्र है जो तूने मुझे बचा लिया मैने तो दस रुपये के लालच मे तेरी शिक्षाओ की बोली लगा दी थी पर तूने सही समय पर मुझे थाम लिया....!

जय जय श्रीराम

Friday, 10 May 2013

11.05.13


 एक बार गाँव में बहुत भीषण बाढ़ आ गई | चारो तरफ पानी ही पानी दिखाई देने लगा, सभी लोग अपनी जान बचाने के लिए ऊँचे स्थानों की तरफ बढ़ने लगे |

जब लोगों ने देखा कि साधु महाराज अभी भी पेड़ के नीचे बैठे भगवान का नाम जप रहे हैं तो उन्हें यह जगह छोड़ने की सलाह दी|
पर साधु ने कहा-
” तुम लोग अपनी जान बचाओ मुझे तो मेरा भगवान बचाएगा!”

धीरे-धीरे पानी का स्तर बढ़ता गया, और पानी साधु के कमर तक आ पहुंचा ,इतने में वहां से एक नाव गुजरी|

मल्लाह ने कहा- ” हे साधू महाराज आप इस नाव पर सवार हो जाइए मैं आपको सुरक्षित स्थान तक पहुंचा दूंगा |”

“नहीं, मुझे तुम्हारी मदद की आवश्यकता नहीं है , मुझे तो मेरा भगवान बचाएगा !! “, साधु ने उत्तर दिया.

नाव वाला चुप-चाप वहां से चला गया.
कुछ देर बाद बाढ़ और प्रचंड हो गयी , साधु ने पेड़ पर चढ़ना उचित समझा और वहां बैठ कर ईश्वर को याद करने लगा | तभी अचानक उन्हें गड़गडाहत की आवाज़ सुनाई दी, एक हेलिकोप्टर उनकी मदद के लिए आ पहुंचा, बचाव दल ने एक रस्सी लटकाई और साधु को उसे जोर से पकड़ने का आग्रह किया|

पर साधु फिर बोला-” मैं इसे नहीं पकडूँगा, मुझे तो मेरा भगवान बचाएगा |”

उनकी हठ के आगे बचाव दल भी उन्हें लिए बगैर वहां से चला गया |

कुछ ही देर में पेड़ बाढ़ की धारा में बह गया और साधु की मृत्यु हो गयी |

मरने के बाद साधु महाराज स्वर्ग पहुचे और भगवान से बोले -. ” हे प्रभु मैंने तुम्हारी पूरी लगन के साथ आराधना की… तपस्या की पर जब मै पानी में डूब कर मर रहा था तब तुम मुझे बचाने नहीं आये, ऐसा क्यों प्रभु ?

भगवान बोले , ” हे साधु महात्मा मै तुम्हारी रक्षा करने एक नहीं बल्कि तीन बार आया , पहला, ग्रामीणों के रूप में , दूसरा नाव वाले के रूप में , और तीसरा,हेलीकाप्टर बचाव दल के रूप में. किन्तु तुम मेरे इन अवसरों को पहचान नहीं पाए |”

मित्रों, इस जीवन में ईश्वर हमें कई अवसर देता है , इन अवसरों की प्रकृति कुछ ऐसी होती है कि वे किसी की प्रतीक्षा नहीं करते है , वे एक दौड़ते हुआ घोड़े के सामान होते हैं जो हमारे सामने से तेजी से गुजरते हैं , यदि हम उन्हें पहचान कर उनका लाभ उठा लेते है तो वे हमें हमारी मंजिल तक पंहुचा देते है, अन्यथा हमें बाद में पछताना ही पड़ता है|

Thursday, 9 May 2013

10.05.13


एक 8 साल के एक लडके की माँ मर जाती है..! बाप ने दूसरी शादी कर ली...
एक दिन बाप ने अपने लडके से पुछा कि बेटा, तुझे अपनी नई माँ और अपनी मरी हुई माँ मेँ क्या फर्क लगा..?
तो वह लडका बोला : मेरी नई माँ सच्ची है और मरी हुई माँ झुठी थी..!!
यह सुनकर बाप अचरज मेँ पड गया,
फिर बोला : क्यु बेटा तुझे ऐसा लगता है..? जिसने तुझे अपनी कोख से जन्म दिया वह
झुठी और कल आई हुई माँ सच्ची क्यु लगती है..?
तो लडका बोला : जब मैँ मस्ती करता था तब मेरी माँ कहती थी कि"अगर तु इस
तरह करेगा तो तुझे खाना नही दुगीँ"फिर भी मैँ बहुत मस्ती करता रहता था.
और मुझे पुरे गाँव मेँ से ढुढँ कर घर लाती और अपने पास बिठाकर अपने हाथो से खाना खिलाती थी..!!
और यह नई माँ कहती है कि"अगर तु
मस्ती करेगा तो तुझे खाना नही दुँगी.... और सच मेँ उसने मुझे आज तीन दिन से खाना नही दिया...;(

Wednesday, 8 May 2013

09.05.13


बस रुकी तो एक बुढ़िया बस में चढ़ी। सीट
खाली न पाकर वह आगे ही खड़ी हो गयी।
बस झटके के साथ चली तो वह लड़खड़ाकर गिर पड़ी। सीटों पर बैठे लोगों ने उसे गिरते हुए देखा। जब तक कोई उठकर उसे उठाता, वह उठी और पास की एक सीट को कसकर पकड़कर खड़ी हो गई।
जिस सीट के पास वह खड़ी थी, उस पर बैठे पुरुष ने उसे बस में चढ़ते, अपने पास
खड़ा होते और गिरते देखा था। लेकिन अन्य बैठी सवारियों की भाँति वह
भी चुप्पी साधे बैठा रहा।
अब बुढ़िया मन ही मन बड़बड़ा रही थी--
कैसा जमाना आ गया है! बूढ़े लोगों पर
भी लोग तरस नहीं खाते। इसे देखो, कैसे
पसरकर बैठा है। शर्म नहीं आती, एक
बूढ़ी-लाचार औरत पास में खड़ी है, लेकिन
मजाल है कि कह दे, आओ माताजी, यहाँ बैठ जाओ...।
तभी, उसके मन ने कहा-- क्यों कुढ़
रही है ?... क्या मालूम यह बीमार हो ?
अपाहिज हो ? इसका सीट पर
बैठना ज़रूरी हो। इतना सोचते ही वह
अपनी तकलीफ़ भूल गयी। लेकिन, मन
था कि वह कुछ देर बाद फिर कुढ़ने लगी--
क्या बस में बैठी सभी सवारियाँ बीमार-
अपाहिज हैं ?... दया-तरस नाम की तो कोई चीज रही ही नहीं।
इधर जब से वह बुढ़िया बस में चढ़ी थी,
पास में बैठे पुरुष के अन्दर भी घमासान
मचा हुआ था। बुढ़िया पर उसे दया आ
रही थी। वह उसे सीट देने की सोच
रहा था, पर मन था कि वहाँ से दूसरी ही आवाज निकलती-- क्यों उठ जाऊँ? सीट पाने के लिए तो वह एक स्टॉप पीछे से बस में चढ़ा है। सफ़र भी कोई छोटा नहीं है। पूरा सफ़र खड़े होकर यात्रा करना कितना कष्टप्रद है। और फिर, दूसरे भी तो देख रहे हैं, वे क्यों नहीं इस बुढ़िया को सीट दे देते?
इधर, बुढ़िया की कुढ़न जारी थी और उधर
पुरुष के भीतर का द्वंद्व। उसके लिए सीट
पर बैठना कठिन हो रहा था--
क्या पता बेचारी बीमार हो?.. शरीर में
तो जान ही दिखाई नहीं देती।
हड्डियों का पिंजर। न जाने कहाँ तक
जाना है बेचारी को ! तो क्या हुआ ?.. न,
न ! तुझे सीट से उठने की कोई ज़रूरत नहीं।
--माताजी, आप बैठो। आखिर वह उठ
खड़ा हुआ। बुढ़िया ने पहले कुछ सोचा, फिर सीट पर सिकुड़कर बैठते हुए बोली-- तू भी आ जा पुत्तर, बैठ जा मेरे संग। थक
जाएगा खड़े-खड़े।