Sunday, 30 June 2013

01.07.13


जानिए, क्या है केदारनाथ का इतिहास.......
....................................................

गिरिराज हिमालय की केदार नामक चोटी पर स्थित है देश के बारह ज्योतिर्लिंगों में सर्वोच्च केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग। केदारनाथ धाम और मंदिर तीन तरफ पहाड़ों से घिरा है। एक तरफ है करीब 22 हजार फुट ऊंचा केदारनाथ, दूसरी तरफ है 21 हजार 600 फुट ऊंचा खर्चकुंड और तीसरी तरफ है 22 हजार 700 फुट ऊंचा भरतकुंड। न सिर्फ तीन पहाड़ बल्कि पांच ‍नदियों का संगम भी है यहां- मं‍दाकिनी, मधुगंगा, क्षीरगंगा, सरस्वती और स्वर्णगौरी। इन नदियों में से कुछ का अब अस्तित्व नहीं रहा लेकिन अलकनंदा की सहायक मंदाकिनी आज भी मौजूद है। इसी के किनारे है केदारेश्वर धाम। यहां सर्दियों में भारी बर्फ और बारिश में जबरदस्त पानी रहता है।

यह उत्तराखंड का सबसे विशाल शिव मंदिर है, जो कटवां पत्थरों के विशाल शिलाखंडों को जोड़कर बनाया गया है। ये शिलाखंड भूरे रंग के हैं। मंदिर लगभग 6 फुट ऊंचे चबूतरे पर बना है। इसका गर्भगृह अपेक्षाकृत प्राचीन है जिसे 80वीं शताब्दी के लगभग का माना जाता है।

मंदिर के गर्भगृह में अर्धा के पास चारों कोनों पर चार सुदृढ़ पाषाण स्तंभ हैं, जहां से होकर प्रदक्षिणा होती है। अर्धा, जो चौकोर है, अंदर से पोली है और अपेक्षाकृत नवीन बनी है। सभामंडप विशाल एवं भव्य है। उसकी छत चार विशाल पाषाण स्तंभों पर टिकी है। विशालकाय छत एक ही पत्थर की बनी है। गवाक्षों में आठ पुरुष प्रमाण मूर्तियां हैं, जो अत्यंत कलात्मक हैं।

85 फुट ऊंचा, 187 फुट लंबा और 80 फुट चौड़ा है केदारनाथ मंदिर। इसकी दीवारें 12 फुट मोटी हैं और बेहद मजबूत पत्थरों से बनाई गई है। मंदिर को 6 फुट ऊंचे चबूतरे पर खड़ा किया गया है। यह आश्चर्य ही है कि इतने भारी पत्थरों को इतनी ऊंचाई पर लाकर तराशकर कैसे मंदिर की शक्ल ‍दी गई होगी। खासकर यह विशालकाय छत कैसे खंभों पर रखी गई। पत्थरों को एक-दूसरे में जोड़ने के लिए इंटरलॉकिंग तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। यह मजबूती और तकनीक ही मंदिर को नदी के बीचोबीच खड़े रखने में कामयाब हुई है।

मंदिर का निर्माण इतिहास : पुराण कथा अनुसार हिमालय के केदार श्रृंग पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनके प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया। यह स्थल केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर अवस्थित है।

यह मंदिर मौजूदा मंदिर के पीछे सर्वप्रथम पांडवों ने बनवाया था, लेकिन वक्त के थपेड़ों की मार के चलते यह मंदिर लुप्त हो गया। बाद में 8वीं शताब्दी में आदिशंकराचार्य ने एक नए मंदिर का निर्माण कराया, जो 400 वर्ष तक बर्फ में दबा रहा।

राहुल सांकृत्यायन के अनुसार ये मंदिर 12-13वीं शताब्दी का है। इतिहासकार डॉ. शिव प्रसाद डबराल मानते हैं कि शैव लोग आदि शंकराचार्य से पहले से ही केदारनाथ जाते रहे हैं, तब भी यह मंदिर मौजूद था। माना जाता है कि एक हजार वर्षों से केदारनाथ पर तीर्थयात्रा जारी है। कहते हैं कि केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग के प्राचीन मंदिर का निर्माण पांडवों ने कराया था। बाद में अभिमन्यु के पौत्र जनमेजय ने इसका जीर्णोद्धार किया था।

मंदिर के कपाट खुलने का समय : दीपावली महापर्व के दूसरे दिन (पड़वा) के दिन शीत ऋतु में मंदिर के द्वार बंद कर दिए जाते हैं। 6 माह तक दीपक जलता रहता है। पुरोहित ससम्मान पट बंद कर भगवान के विग्रह एवं दंडी को 6 माह तक पहाड़ के नीचे ऊखीमठ में ले जाते हैं। 6 माह बाद मई माह में केदारनाथ के कपाट खुलते हैं तब उत्तराखंड की यात्रा आरंभ होती है।

6 माह मंदिर और उसके आसपास कोई नहीं रहता है, लेकिन आश्चर्य की 6 माह तक दीपक भी जलता रहता और निरंतर पूजा भी होती रहती है। कपाट खुलने के बाद यह भी आश्चर्य का विषय है कि वैसी ही साफ-सफाई मिलती है जैसे छोड़कर गए थे

Saturday, 29 June 2013

30.06.13


"भगवान् श्रीकृष्ण"

बहुत पुरानी और परखी हुई कहावत है कि हर दाने पर खाने वाले का नाम लिखा होता है।

सेठ जी को यकीन नहीं आया, सो साधू से बहस कर बैठे।
देखो, नतीजा क्या हुआ।

एक सेठ जी आंगन में बैठे कुछ दाने चबा रहे थे।
तभी एक साधू उधर से निकला।

उसने सेठजी से कहा - ‘कुछ भिक्षा मिल जाए।’

सेठ जी बोले- ‘जाओ-जाओ।’

साधू बोला - ‘भूखा हूं।
खाने के लिए कुछ दाने ही दे दो।’

सेठ जी बोले, ‘दाने मुफ्त में नहीं मिलते।
बच जाएंगे, तो दे दूंगा।’

साधू बोला, ‘एक व्यक्ति सभी दाने कैसे खा सकता है?
दाने-दाने पर खाने वाले का नाम लिखा होता है।’

यह सुनकर सेठजी को क्रोध आ गया।
वे बोले, ‘अपने आपको बहुत ही ज्ञानी समझते हो।
इधर मेरे हाथ में पकड़े इस दाने को देखो और बताओ कि इस पर किसका नाम लिखा है?’

साधू ने मुस्कराते हुए कहा, ‘इस पर कौए का नाम लिखा है।
यह दाना उसी का आहार है।’

सेठ जी बोले, ‘देखो मैं इसे खा जाऊंगा।
कहां है तुम्हारा कौआ?’

ऐसा कहते हुए सेठ जी ने वह दाना मुंह में डाला, पर वह मुंह में न जाकर उनकी नाक में घुस गया।

सेठजी की सांस रुक गई।
लोग इकट्ठा हो गए।

उन्हें वैद्य जी के पास ले गए।
वैद्य जी ने फौरन चिमटी से सेठ जी की नाक में फंसा दाना निकाल दिया और पास ही फेंक दिया।

तभी एक कौआ आया और वह दाना चोंच में दबाकर उड़ गया।
साधू भी उस समय वहीं पर था।
वह बोला - ‘देखो, उस दाने पर कौए का ही नाम लिखा था।’

सेठ जी की अकल ठिकाने आ गई।
उन्होंने साधू से माफी मांगी और अपने घर ले जाकर आदरपूर्वक भोजन कराया।

Friday, 28 June 2013

29.06.13


एक सच्ची कहानी
************
एक व्यक्ति बहुत नास्तिक था उसको भगवान पर विश्वास नहीं था. एक बार उसके साथ दुर्घटना घटित हुई ,वो रोड पर पड़ा पड़ा सब की ओर कातर निगाहों से मदद के लिए देख रहा था, पर कलियुग का इंसान - किसी इंसान की मदद जल्दी नहीं करता, मालूम नहीं क्यों, वो येही सोच कर थक गया | तभी उसके नास्तिक मन ने अनमनेसे प्रभु को गुहार लगाई उसी समय एक ठेलेवाला वह से गुजरा उसने उसको गोद में उठाया और चिकित्सा हेतु ले गया उसने उनके परिवार वालो को फ़ोन किया और अस्पताल बुलाया सभी आये उस व्यक्ति को बहुत धन्यवाद दिया उसके घर का पता भी लिखवा लिया जब यह ठीक हो जायेगा तो आप से मिलने आयेंगे - वो सज्जन सही हो गए कुछ दिन बाद वो अपने परिवार के साथ उस व्यक्ति से मिलने काइरादा बनाते है और निकल पड़ते है मिलने| वो बाके बिहारी का नाम पूछते हुए उस पते पर जाते है उनको वहा पर प्रभु का मंदिर मिलता है, वो अचंभित से उस भवन को देखते है, और उसके अन्दर चले जाते जातेहै | अभी भी वहा पर पुजारी से नाम लेकर पूछते है की यह बाके बिहारी कहा मिलेगा - पुजारी हाथ जोड़ मूर्ति की ओर इशारा कर के कहता है की यहाँ यही एक बाके बिहारी है | खैर वो मंदिर से लौटने लगतेहै तो उनकी निगाह एक बोर्ड पर पड़ती है उसमे एक वाक्य लिखा दिखता है - कि "इंसान ही इंसान के काम आता है, उस से प्रेम करतेरहो मै तो तुम्हे स्वयं मिल जाऊंगा |

Thursday, 27 June 2013

28.06.13


2 मिनट लगेगा जरूर पढना _
शहर से दूर एक घने जंगल में एक आम का पेङ था और
एक लंबा और घना नीम का पेङ था | नीम का पेङ
अपने पडोसी पेङ से बात तक नहीं करता था |
उसको अपने बङे होने पर घमंड था |
एक बार एक रानी मधुमख्खी नीम के पेड़ के पास
पहुची और उसने कहाँ “नीम भाई में आपके यहाँ पर
आपने शहद का छत्ता बना लू ” तब नीम के पेड़ ने
कहाँ “नहीं जा जाकर कही और
अपना छत्ता बना ” | इतना सुनकर आम के पेड़ ने
कहाँ “भाई छत्ता क्यों नहीं बना लेने देते यह
तुम्हारे पेड़ पर सुरक्षित रह सकेंगी |” इतने पर नीम
के पेड़ ने आम के पेड़ को जवाब दिया कि मुझे
तुम्हारी सलाह कि आवश्यकता नहीं हें |
रानी मधुमख्खी ने फिर से आग्रह
किया तो भी नीम के पेड़ ने मना कर दिया |
रानी मधुमख्खी आम के पेड़ के पास गई और कहने
लगी क्या मै आपकी शाखा पर 
अपना छत्ता बना लूँ | इस पर आम के पेड़ ने उसे
सहमति दे दी रानी मधुमख्खी ने
छत्ता बना लिया और सुखपूर्वक रहने लगी |
अभी कुछ दिनों बाद कुछ व्यक्ति वहाँ पर आये और
कहने लगे कि इस आम के पेड़ को काटते हें तभी एक
व्यक्ति कि नजर मधुमख्खी के छत्ते पर पड़ी और
उसने कहाँ यदि हम इस पेड़ को काटते हें तो यह
मधुमख्खी हमें नहीं छोडेगी | अतः हम नीम के पेड़
को काटते हें | इससे हमको कोई खतरा नहीं हें | और
लकडियां भी हमे अधिक मात्रा में मिल जाएँगी |
यह सब बाते सुनकर नीम डर गया अब वह कर
भी क्या सकता था |
दूसरे दिन सभी व्यक्ति आये और पेड़ काटने लगे
तो नीम ने कहाँ “ मुझे बचाओ – मुझे बचाओ
नही तो ये लोग मुझको काट डालेंगे ”| तब
मधुमख्खियो ने उन लोगों पर हमला कर दिया और
उन्हें वहाँ से भगा दिया |
नीम के पेड़ ने मधुमख्खियो को धन्यवाद
दिया तो इस पर मधुमख्खियो ने कहाँ “धन्यवाद
हमें नही आम भाई को दो यदि वह हमसे नहीं कहते
तो हम आपको नहीं बचाते ”|
सीख...“कभी कभी बड़े और महान होने का एहसास
हमें घमंडी और क्रूर बना देता हें | जिससे हम अपने
सच्चे साथियों से दूर हो जाते हें |”

Wednesday, 26 June 2013

27.06.13


भारत के बारे मे रोचक तथ्य -

भारत ने दुनिया को बहुत कुछ दिया और भारत ने अपने 10 हजार वर्षों के इतिहास में, सक्षम होते हुए भी कभी किसी अन्य देश पर आक्रमण नही किया। आइए, भारत के बारे में कुछ जानें:

*. भारतीय सँस्कृति व सभ्यता विश्व की पुरातन में से एक है।

*. भारत दुनिया का सबसे पुरातन व सबसे बड़ा लोकतंत्र है।

*. भारत ने शून्य की खोज की। अंकगणित का आविष्कार 100 ईसा पूर्व भारत मे हुआ था।

*. हमारी संस्कृत भाषा सभी भाषाओं की जननी मानी जाती है। सभी यूरोपीय भाषाएँ संस्कृत पर आधारित मानी जाती है ।

*. सँसार का प्रथम विश्वविद्यालय 700 ई. पू. तक्षशिला में स्थापित की गई थी। तत्पश्चात चौथी शताब्दी में नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना की गई।

*. 5000 वर्ष पूर्व जब अन्य संस्कृतियां खानाबदोश व वनवासी जीवन जी रहे थे तब भारतीयों ने सिंधु घाटी की सभ्यता में हड़प्पा संस्कृति की स्थापना की।
*. महर्षि सुश्रुत सर्जरी के आविष्कारक माने जाते हैं। 2600 साल पहले उन्होंने अपने समय के स्वास्थ्य वैज्ञानिकों के साथ प्रसव , मोतियाबिंद , कृत्रिम अंग लगाना , पत्थरी का इलाज और प्लास्टिक सर्जरी जैसी कई तरह की जटिल शल्य चिकित्सा के सिद्धांत प्रतिपादित किए।

*. ब्रिटिश राज से पहले तक भारत विश्व का सबसे समृद्ध राष्ट्र था व इसे , ' सोने की चिड़िया ' कहा जाता था ।

*. आधुनिक भवन निर्माण पुरातन भारतीय वास्तु शास्त्र से प्रेरित है।

*. कुंग फू मूलत: एक बोधिधर्म नाम के बोद्ध भिक्षु के द्वारा विकसित किया गया था जो 500 ई के आसपास भारत से चीन गए।

*. वाराणसी अथवा बनारस दुनिया के सबसे प्राचीन नगरों में से एक है। महात्मा बुद्ध ने 500 ई. पू. बनारस की यात्रा की थी। बनारस विश्व का एकमात्र ऐसा प्राचीन नगर है जो आज भी अस्तित्व में है।

*. सबसे प्राचीन उपचार प्रणाली आयुर्वेद है।

*. बीजगणित की खोज भारत में हुई।

*. रेखा गणित की खोज भारत में हुई थी।

*. शतरंज अथवा अष्टपद की खोज भारत मे हुई थी।

*. हिन्दू , बौद्ध , जैन अथवा सिख धर्मों का उदय भारत में हुआ।

*. कम्प्यूटर के लिए सबसे उपयुक्त भाषा भी संस्कृत ही मानी है।

Tuesday, 25 June 2013

26.06.13


बहुत समय पहले की बात है , एक वृद्ध सन्यासी हिमालय की पहाड़ियों में कहीं रहता था. वह बड़ा ज्ञानी था और उसकी बुद्धिमत्ता की ख्याति दूर -दूर तक फैली थी. एक दिन एक औरत उसके पास पहुंची और अपना दुखड़ा रोने लगी , ” बाबा, मेरा पति मुझसे बहुत प्रेम करता था , लेकिन वह जबसे युद्ध से लौटा है ठीक से बात तक नहीं करता .”

” युद्ध लोगों के साथ ऐसा ही करता है.” , सन्यासी बोला.

” लोग कहते हैं कि आपकी दी हुई जड़ी-बूटी इंसान में फिर से प्रेम उत्पन्न कर सकती है , कृपया आप मुझे वो जड़ी-बूटी दे दें.” , महिला ने विनती की.
सन्यासी ने कुछ सोचा और फिर बोला ,” देवी मैं तुम्हे वह जड़ी-बूटी ज़रूर दे देता लेकिन उसे बनाने के लिए एक ऐसी चीज चाहिए जो मेरे पास नहीं है .”

” आपको क्या चाहिए मुझे बताइए मैं लेकर आउंगी .”, महिला बोली.

” मुझे बाघ की मूंछ का एक बाल चाहिए .”, सन्यासी बोला.
अगले ही दिन महिला बाघ की तलाश में जंगल में निकल पड़ी , बहुत खोजने के बाद उसे नदी के किनारे एक बाघ दिखा , बाघ उसे देखते ही दहाड़ा , महिला सहम गयी और तेजी से वापस चली गयी.

अगले कुछ दिनों तक यही हुआ , महिला हिम्मत कर के उस बाघ के पास पहुँचती और डर कर वापस चली जाती. महीना बीतते-बीतते बाघ को महिला की मौजूदगी की आदत पड़ गयी, और अब वह उसे देख कर सामान्य ही रहता. अब तो महिला बाघ के लिए मांस भी लाने लगी , और बाघ बड़े चाव से उसे खाता. उनकी दोस्ती बढ़ने लगी और अब महिला बाघ को थपथपाने भी लगी. और देखते देखते एक दिन वो भी आ गया जब उसने हिम्मत दिखाते हुए बाघ की मूंछ का एक बाल भी निकाल लिया.
फिर क्या था , वह बिना देरी किये सन्यासी के पास पहुंची , और बोली
” मैं बाल ले आई बाबा .”

“बहुत अच्छे .” और ऐसा कहते हुए सन्यासी ने बाल को जलती हुई आग में फ़ेंक दिया

” अरे ये क्या बाबा , आप नहीं जानते इस बाल को लाने के लिए मैंने कितने प्रयत्न किये और आपने इसे जला दिया ……अब मेरी जड़ी-बूटी कैसे बनेगी ?” महिला घबराते हुए बोली.

” अब तुम्हे किसी जड़ी-बूटी की ज़रुरत नहीं है .” सन्यासी बोला . ” जरा सोचो , तुमने बाघ को किस तरह अपने वश में किया….जब एक हिंसक पशु को धैर्य और प्रेम से जीता जा सकता है तो क्या एक इंसान को नहीं ?

Monday, 24 June 2013

25.06.13


कर्मफल अवश्य भोगने पड़ेंगे..........................


एक राजा हाथी पर सवार हो बड़ी धूमधाम के साथ चला जा रहा था। उसका हाथी ही दुष्ट था। जिस समय किसी प्रयोजनार्थ राजा हाथी से उतरा कि हाथी बिगड़ गया और राजा के ऊपर सूँड़ से प्रहार करने को दौड़ा। राजा हाथी की यह दशा देखकर जान बचाने के लिए वहाँ से भाग खड़ा हुआ, किंतु बिगड़ैल हाथी ने उसका पीछा किया। उसने राजा को एक ऐसे अँधे कुएँ में ले जाकर डाला, जिसके एक किनारे पर पीपल का वृक्ष था, जिसकी जड़े कुएँ के भीतर से निकल रही थीं, जो आधे कुएँ तक फैली थीं।

राजा के कुएँ में गिरते ही उसका पैर पीपल की जड़ों में फँस गया। अब राजा का सिर नीचे और पैर ऊपर को थे। राजा की दृष्टि जब नीचे को पड़ी, तो वह क्या देखता है कि कुएँ में बड़े-बड़े विकराल काले साँप, विशखोपरे और कछुए ऊपर को मुँह कर रहे हैं, जिन्हें देख राजा काँप गया कि यदि जड़ से मेरा पैर कदाचित् छूट गया और मैं कुएँ में गिरा तो मुझे ये दुष्ट जीव उसी समय भक्षण कर जाएँगे। जब ऊपर की ओर उसने दृष्टि डाली, तो देखा कि दो चूहे, एक काला और एक सफेद जिस जड़ में उसका पैर फँस रहा है, उसे कुतर रहे हैं। राजा ने विचारा कि मैं यदि जड़ पकड़कर किसी प्रकार ऊपर निकल भी जाऊँ तो मतवाला हाथी ठोकर लगाने को ऊपर ही खड़ा है, नीचे साँप आदि जंतु हैं और जड़ का यह हाल है। निदान राजा घोर विपत्ति में फँस गया। उस पीपल के वृक्ष पर ऊपर की तरफ से मक्खियों ने एक छत्ता लगा रखा था, जिससे एक एक बूँद शहद धीरे धीरे टपकता था और वह शहद कभी-कभी राजा के मुँह में आ गिरता था, जिसको वह ऐसी आपत्ति में होते हुए भी सब कुछ चाटने लगता। उसे इस बात का किंचित् मात्र भी ध्यान न रहा कि इस जड़ के टूटते ही मेरी क्या दशा होगी ?

मित्रों, इसका दृष्टांत यों है-यह जीवात्मारूपी राजा कर्मरूपी हाथी पर सवार है। चाहे वह इसे सुमार्ग से ले जाए, चाहे कुमार्ग से। जिस समय इस कर्मरूपी हाथी से यह उतरा है उस समय कर्मरूपी हाथी इस पर प्रहार करने दौड़ता है और इसे खदेड़कर माता के गर्भाशयरूपी अंधे कुएँ में जाकर डालता है। उस कुएँ में आयुरूपी वृक्ष की जड़ में इसका पैर फँसा रहता है और जब यह उस जड़ में उलटा लटका (गर्भाशय में प्रत्येक पुरुष का सिर नीचे और पैर ऊपर होते हैं) कुएँ में नीचे के संसार को देखता है, तो उसमें बड़े-बड़े भयंकर साँप, विषखोपरे और कछुए यानी काम, क्रोध, लोभ, अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष, तृष्णा आदि इस आशय से मुँह फाड़े ऊपर को देख रहे हैं कि यह ऊपर से गिरे और हम इसको अपना भक्ष्य बनाएँ। यह देख जीवन-रुपी राजा अत्यंत व्याकुल होता है।

जब यह ऊपर की ओर दृष्टि डालता है तो इसी आयुरूपी जड़ को दो काले सफेद चूहे यानी सफेद चूहा दिन और काला चूहा रात, इसकी आयुरूपी जड़, जिसमें इसका पैर फँसा है, काट रहे हैं और जब यह विचारता है कि यदि इस कुएँ से मैं किसी प्रकार जड़ पकड़कर निकल जाऊँ, तो कर्मरूपी हाथी ठोकर लगाने को ऊपर खड़ा है। इस दशा में जो मक्खीरूपी विषय का शहद (रूप, रस, गंध, शब्द, स्वर्श) उसका आस्वादन करने में यह ऐसा निमग्न हो जाता है कि सारी विपत्तियों को भूल जाता है। इसे यह भी स्मरण नहीं रहता कि आयुरूपी जड़ अभी कटने वाली है, जिससे गिरकर मैं इन सर्प, कछुओं का भोजन बनूँगा इसलिए हम क्यों न ऐसा कर्म करें कि जिससे हाथी खदेड़कर हमें गर्भाशयरूपी कुएँ में न डाल पाए अर्थात् हम लोग ऐसे सत्य कर्म करें, जिससे भयानक अंधे कुओं में न जाना पड़े और मोक्ष प्राप्त करें।