Thursday, 28 February 2013

01.03.13


निबंध-

प्राथमिक पाठशाला की एक शिक्षिका ने अपने छात्रों को एक निबंध लिखने को कहा. विषय था "भगवान से आप क्या बनने का वरदान मांगेंगे" इस निबंध ने उस क्लास टीचर को इतना भावुक कर दिया कि रोते-रोते उस निबंध को लेकर वह घर आ गयी. पति ने रोने का कारण पूछा तो उसने जवाब दिया इसे पढ़ें, यह मेरे छात्रों में से एक ने यह निबंध लिखा है..

निबंध कुछ इस प्रकार था:-

हे भगवान, मुझे एक टीवी बना दो क्योंकि तब मैं अपने परिवार में ख़ास जगह ले पाऊंगा और बिना रूकावट या सवालों के मुझे ध्यान से सुना व देखा जायेगा. जब मुझे कुछ होगा तब टीवी खराब की खलबली पूरे परिवार में सबको होगी और मुझे जल्द से जल्द सब ठीक हालत में देखने के लिए लालायित रहेंगे. वैसे मम्मी पापा के पास स्कूल और ऑफिस में बिलकुल टाइम नहीं है लेकिन मैं जब अस्वस्थ्य रहूँगा तब मम्मी का चपरासी और पापा के ऑफिस का स्टाफ मुझे सुधरवाने के लिए दौड़ कर आएगा. दादा का पापा के पास कई बार फोन चला जायेगा कि टीवी जल्दी सुधरवा दो दादी का फेवरेट सीरियल आने वाला हे. मेरी दीदी भी मेरे साथ रहने के लिए के लिए हमेशा सबसे लडती रहेगी. पापा जब भी ऑफिस से थक कर आएँगे मेरे साथ ही अपना समय गुजारेंगे. मुझे लगता है कि परिवार का हर सदस्य कुछ न कुछ समय मेरे साथ अवश्य गुजारना चाहेगा मैं सबकी आँखों में कभी ख़ुशी के तो कभी गम के आंसू देख पाऊंगा. आज मैं "स्कूल का बच्चा" मशीन बन गया हूँ. स्कूल में पढ़ाई घर में होमवर्क और ट्यूशन पे ट्यूशन ना तो मैं खेल पाता हूँ न ही पिकनिक जा पाता हूँ इसलिए भगवान मैं सिर्फ एक टीवी की तरह रहना चाहता हूँ, कम से कम रोज़ मैं अपने परिवार के सभी सदस्यों के साथ अपना बेशकीमती समय तो गुजार पाऊंगा.

पति ने पूरा निबंध ध्यान से पढ़ा और अपनी राय जाहिर की. हे भगवान ! कितने जल्लाद होंगे इस गरीब बच्चे के माता पिता !

पत्नी ने पति को करुण आँखों से देखा और कहा,...... यह निबंध हमारे बेटे ने लिखा है !!

Wednesday, 27 February 2013

28.02.13


एक आदमी जब पैदा होता है तो उस समय जब
उसकी जीवन उर्जा बड़ी संवेदनशील होती है
तो उसे एक स्त्री ही संभालती है…



….
वो है उसकी माँ.
.…

फिर जब थोडा सा बड़ा होता है (बैठने लायक)
तो वहां भी एक लड़की ही मिलती है
जो उसकी देखरेख करती है उसके साथ खेलती है
….
उसका मन बहलाती है……. जब तक
की वो इतना बड़ा नहीं हो जाता की बाहर
के संसार में अपने दोस्त बना सके…

..
….
वो है उसकी बहिन……
……
फिर जब वो स्कूल जाता है तो वहां फिर एक
महिला है जो उसकी सहायता
करती है….. चीज़ों को समझने में………… उसे
सहारा देती है, उसकी कमजोरियों को दूर करने
में….. और उसको एक अच्छा इंसान बनाने
में…

……
वो है उसकी अध्यापिका…
…….…
फिर जब वो बड़ा होता है……….. और जब जीवन
से उसका संघर्ष शुरू
होता है…. जब भी वो संघर्ष में वो कमजोर
हो जाता है…..
तो एक लड़की ही उसको साहस देती है


वो है उसकी प्रेमिका
(सामान्यत:)

……. .
जब आदमी को जरूरत होती है………. साथ
की अपनी अभिव्यक्ति प्रकट
करने के लिए …… अपना दुःख और सुख बाटने
के लिए फिर एक लड़की वहां
होती है…

…..
वो है उसकी पत्नी……
…..
फिर जब जीवन के संघर्ष और रोज
की मुश्किलों का
सामना करते करते आदमी कठोर होने लगता है
……..
तब उसे निर्मल बनाने वाली भी एक
लड़की ही होती है…

…..
और वो है उसकी बेटी.……
……
और जब आदमी की जीवन यात्रा ख़त्म होगी तब
फिर एक स्त्रीलिंग ही होगी जिससे उसका अंतिम
मिलन होगा ….. जिसमे वो समां कर
पूरा हो जायेगा…
....
...
… और वो होगी मात्रभूमि…
…..…
.
.
.
.
याद रखें अगर आप मर्द हैं तो सम्मान दें हर
महिला को…
……

……
जो हर पल आपके साथ किसी न किसी रूप में है…
…….
और अगर आप महिला हैं तो गर्व करें अपने
महिला होने पर.

...

Tuesday, 26 February 2013

27.02.13


भगवान् का पता!
एक बार एक फ़क़ीर भीख मांगने के लिए मस्जिद के बाहर बैठा हुआ
होता है।
सब नमाज़ी उस से आँख बचा कर चले गए और उसे कुछ नहीं मिला।
वो फिर चर्च गया।
फिर मंदिर और फिर गुरुद्वारे।
लेकिन उसको किसी ने कुछ नहीं दिया।
आखिरी में वह हार कर एक शराब की दुकान के बहार आ कर बैठ
गया।
उस शराब की दुकान से जो भी निकलता उसके कटोरे में कुछ न कुछ
डाल देता।
कुछ देर बाद उसका कटोरा नोटों से भर गया तो नोटों से
भरा कटोरा देख कर फ़क़ीर ने आसमान की तरफ देखा और बोला।
"वाह रे प्रभु" रहते कहाँ हो और पता कहाँ का देते हो...!

Monday, 25 February 2013

26 .02.13


प्राचीन काल में एक राजा का यह नियम था कि वह अनगिनत संन्यासियों को दान देने के बाद ही भोजन ग्रहण करता था.

एक दिन नियत समय से पहले ही एक संन्यासी अपना छोटा सा भिक्षापात्र लेकर द्वार पर आ खड़ा हुआ. उसने राजा से कहा – “राजन, यदि संभव हो तो मेरे इस छोटे से पात्र में भी कुछ भी डाल दें.”

याचक के यह शब्द राजा को खटक गए पर वह उसे कुछ भी नहीं कह सकता था. उसने अपने सेवकों से कहा कि उस पात्र को सोने के सिक्कों से भर दिया जाय.

जैसे ही उस पात्र में सोने के सिक्के डाले गए, वे उसमें गिरकर गायब हो गए. ऐसा बार-बार हुआ. शाम तक राजा का पूरा खजाना खाली हो गया पर वह पात्र रिक्त ही रहा.

अंततः राजा ही याचक स्वरूप हाथ जोड़े आया और उसने संन्यासी से पूछा – “मुझे क्षमा कर दें, मैं समझता था कि मेरे द्वार से कभी कोई खाली हाथ नहीं जा सकता. अब कृपया इस पात्र का रहस्य भी मुझे बताएं. यह कभी भरता क्यों नहीं?”

संन्यासी ने कहा – “यह पात्र मनुष्य के ह्रदय से बना है. इस संसार की कोई वस्तु मनुष्य के ह्रदय को नहीं भर सकती. मनुष्य कितना ही नाम, यश, शक्ति, धन, सौंदर्य, और सुख अर्जित कर ले पर यह हमेशा और की ही मांग करता है. केवल ईश्वरीय प्रेम ही इसे भरने में सक्षम है.”

Sunday, 24 February 2013

25.02.13


Jai $hree Radhe Kri$hna ..
Radhe Radhe..

कर्म के आगे खुद भगवान भी झुके......

एक बार की बात है, भगवान और देवराज इंद्र में इस बात पर बहस छिड़ गई कि दोनों में से श्रेष्ठ कौन हैं? उनका विवाद बढ़ गया तब इंद्र ने यह सोचकर वर्षा करनी बंद कर दी कि यदि वे बारह वर्षों तक पृथ्वी पर वर्षा नहीं करेंगे तो भगवान पृथ्वीवासियों को कैसे जीवित रख पाएंगे।

इंद्र की आज्ञा से मेघों ने जल बरसाना बंद कर दिया। किंतु किसानों ने सोचा कि यदि यह लड़ाई बारह वर्षों तक चलती रही तो वे अपना कर्म ही भूल बैठेंगे। उनके पुत्र भी सब कुछ भूल जाएंगे। अतः उन्हें अपना कर्म करते रहना चाहिए। यह सोचकर उन्होंने कृषि कार्य शुरू कर दिया। वे अपने-अपने खेत जोतने लगे।

तभी मिट्टी के नीचे छिपा कर मेढ़क बाहर आया और किसानों को खेती करते देख आश्चर्यचकित होकर बोला- “इंद्र देव और भगवान में श्रेष्ठता की लड़ाई छिड़ी हुई है। इसी कारण इंद्र देव ने बारह वर्षों तक पृथ्वी पर वर्षा न करने का निश्चय किया है। फिर भी आप लोग खेत जोत रहे हैं! यदि वर्षा ही न हुई तो खेत जोतने का क्या लाभ?”

किसान बोले-“मेढ़क भाई! यदि उनकी लड़ाई वर्षों तक चलती रही तो हम अपना कर्म ही भूल जाएंगे। इसलिए हमें अपना कर्म तो करते ही रहना चाहिए।”

मेढ़क ने सोचा- ‘तो मैं भी टर्राता हूं, नहीं तो मैं भी टर्राना भूल जाऊंगा। तब वह भी टर्राने लगा।’ उसने टर्राना शुरू किया तो मोर ने भी इंद्र एवं भगवान के मध्य लड़ाई की बात कही। मेढ़क बोला-“मोर भाई! हमें तो अपना कर्म करते ही रहना चाहिए, चाहे दूसरे अपने कार्य भूल जाएं।

क्योंकि यदि हम अपने कर्म भूल जाएंगे तो आने वाली पीढ़ी को कैसे मालूम होगा कि उन्हें क्या कर्म करने हैं। अतः सबको अपना कर्म करने चाहिएं। फल क्या और कब मिलता है, यह ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए।” मेढ़क की बात सुनकर मोर भी पिहू-पिहू बोलने लगा।

देवराज इंद्र ने जब देखा कि सभी प्राणी अपने-अपने कार्य में लगे हैं तो उन्होंने सोचा कि ‘शायद इन्हें ज्ञात नहीं है कि मैं बारह वर्षों तक नहीं बरसूंगा। इसलिए ये अपने कर्म कर रहे हैं। मुझे जाकर इन्हें सत्य बताना चाहिए।’

यह सोचकर वे पृथ्वी पर आए और किसानों से बोले-“ये क्या कर रहे हो?”

किसान बोले- “भगवन! हमारा कर्म ही ईश्वर है। आप अपना कार्य करें अथवा न करें, हमें तो अपना कर्म करते ही रहना है।”

किसानों की बात सुन देवराज इंद्र ने अपनी जिद्द छोड़ते हुए बादलों को आदेश दिया कि वे पृथ्वी पर घनघोर बरसें ।

Saturday, 23 February 2013

24.02.13


एक हिन्दू सन्यासी अपने शिष्यों के साथ गंगा नदी के तट पर नहाने पहुंचा. वहां एक ही परिवार के कुछ लोग अचानक आपस में बात करते-करते एक दूसरे पर क्रोधित हो उठे और जोर-जोर से चिल्लाने लगे.

सन्यासी यह देख तुरंत पलटा और अपने शिष्यों से पुछा;

"क्रोध में लोग एक दूसरे पर चिल्लाते क्यों हैं ?"

शिष्य कुछ देर सोचते रहे, एक ने उत्तर दिया, "क्योंकि हम क्रोध में शांति खो देते हैं इसलिए !”

"पर जब दूसरा व्यक्ति हमारे सामने ही खड़ा है तो भला उस पर चिल्लाने की क्या ज़रुरत है, जो कहना है वो आप धीमी आवाज़ में भी तो कह सकते हैं", सन्यासी ने पुनः प्रश्न किया.

कुछ और शिष्यों ने भी उत्तर देने का प्रयास किया पर बाकी लोग संतुष्ट नहीं हुए.

अंततः सन्यासी ने समझाया…

“जब दो लोग आपस में नाराज होते हैं तो उनके दिल एक दूसरे से बहुत दूर हो जाते हैं. और इस अवस्था में वे एक दूसरे को बिना चिल्लाये नहीं सुन सकते… वे जितना अधिक क्रोधित होंगे उनके बीच की दूरी उतनी ही अधिक हो जाएगी और उन्हें उतनी ही तेजी से चिल्लाना पड़ेगा.

क्या होता है जब दो लोग प्रेम में होते हैं ? तब वे चिल्लाते नहीं बल्कि धीरे-धीरे बात करते हैं, क्योंकि उनके दिल करीब होते हैं, उनके बीच की दूरी नाम मात्र की रह जाती है.”

सन्यासी ने बोलना जारी रखा,” और जब वे एक दूसरे को हद से भी अधिक चाहने लगते हैं तो क्या होता है ? तब वे बोलते भी नहीं, वे सिर्फ एक दूसरे की तरफ देखते हैं और सामने वाले की बात समझ जाते हैं.”

♥ ♥ जब किसी से बात करो तो ये ध्यान रखें कि दिलों में दूरी न होने पाए, ऐसे शब्द मत बोलो जिससे हमारे बीच की दूरी बढे नहीं तो एक समय ऐसा आएगा कि ये दूरी इतनी अधिक बढ़ जाएगी कि हमें लौटने का रास्ता भी नहीं मिलेगा. इसलिए बात करो, चर्चा करो, लेकिन चिल्लाओ मत.♥ ♥

Friday, 22 February 2013

23.02.13


एक हिन्दू सन्यासी अपने शिष्यों के साथ गंगा नदी के तट पर नहाने पहुंचा. वहां एक ही परिवार के कुछ लोग अचानक आपस में बात करते-करते एक दूसरे पर क्रोधित हो उठे और जोर-जोर से चिल्लाने लगे.

संयासी यह देख तुरंत पलटा और अपने शिष्यों से पुछा;

"क्रोध में लोग एक दूसरे पर चिल्लाते क्यों हैं ?"

शिष्य कुछ देर सोचते रहे, एक ने उत्तर दिया, "क्योंकि हम क्रोध में शांति खो देते हैं इसलिए !”

"पर जब दूसरा व्यक्ति हमारे सामने ही खड़ा है तो भला उस पर चिल्लाने की क्या ज़रुरत है, जो कहना है वो आप धीमी आवाज़ में भी तो कह सकते हैं", सन्यासी ने पुनः प्रश्न किया.

कुछ और शिष्यों ने भी उत्तर देने का प्रयास किया पर बाकी लोग संतुष्ट नहीं हुए.

अंततः सन्यासी ने समझाया…

“जब दो लोग आपस में नाराज होते हैं तो उनके दिल एक दूसरे से बहुत दूर हो जाते हैं. और इस अवस्था में वे एक दूसरे को बिना चिल्लाये नहीं सुन सकते… वे जितना अधिक क्रोधित होंगे उनके बीच की दूरी उतनी ही अधिक हो जाएगी और उन्हें उतनी ही तेजी से चिल्लाना पड़ेगा.

क्या होता है जब दो लोग प्रेम में होते हैं ? तब वे चिल्लाते नहीं बल्कि धीरे-धीरे बात करते हैं, क्योंकि उनके दिल करीब होते हैं, उनके बीच की दूरी नाम मात्र की रह जाती है.”

सन्यासी ने बोलना जारी रखा,” और जब वे एक दूसरे को हद से भी अधिक चाहने लगते हैं तो क्या होता है ? तब वे बोलते भी नहीं, वे सिर्फ एक दूसरे की तरफ देखते हैं और सामने वाले की बात समझ जाते हैं.”