Wednesday, 7 August 2013

08.08..13


वृंदावन में एक कथा प्रचलित है कि एक गरीब
ब्राह्मण बांके बिहारी का परम भक्त था।
एक बार उसने एक महाजन से कुछ रुपये उधार लिए।
हर महीने उसे थोड़ा- थोड़ा करके वह
चुकता करता था। जब अंतिम किस्त रह गई तब
महाजन ने उसे अदालती नोटिस
भिजवा दिया कि अभी तक उसने उधार
चुकता नहीं किया है, इसलिए पूरी रकम मय व्याज
वापस करे।
ब्राह्मण परेशान हो गया। महाजन के पास जा कर
उसने बहुत सफाई दी, अनुनय-विनय किया, लेकिन
महाजन अपने दावे से टस से मस नहीं हुआ।
मामला कोर्ट में पहुंचा।कोर्ट में भी ब्राह्मण ने जज
से वही बात कही,
मैंने सारा पैसा चुका दिया है। महाजन झूठ बोल
रहा है।
जज ने पूछा, कोई गवाह है जिसके सामने तुम
महाजन को पैसा देते थे।
कुछ सोच कर उसने कहा,
हां, मेरी तरफ से गवाही बांके बिहारी देंगे।
अदालत ने गवाह का पता पूछा तो ब्राह्मण ने
बताया, बांके बिहारी, वल्द वासुदेव, बांके
बिहारी मंदिर, वृंदावन।
उक्त पते पर सम्मन जारी कर दिया गया।
पुजारी ने सम्मन को मूर्ति के सामने रख कर कहा,
भगवन, आप को गवाही देने कचहरी जाना है।
गवाही के दिन सचमुच एक बूढ़ा आदमी जज के
सामने खड़ा हो कर बता गया कि पैसे देते समय मैं
साथ होता था और फलां- फलां तारीख को रकम
वापस की गई थी।
जज ने सेठ का बही- खाता देखातो गवाही सच
निकली। रकम दर्ज थी, नाम
फर्जी डाला गया था।जज ने ब्राह्मण को निर्दोष
करार दिया। लेकिन उसके मन में यह उथल पुथल
मची रही कि आखिर वह गवाह था कौन।
उसने ब्राह्मण से पूछा। ब्राह्मण ने बताया कि वह
तो सर्वत्र रहता है, गरीबों की मदद के लिए अपने
आप आता है।
इस घटना ने जज को इतना उद्वेलित किया कि वह
इस्तीफा देकर, घर-परिवार छोड़ कर फकीर बन
गया।
बहुत साल बाद वह वृंदावन लौट कर आया पागल
बाबा के नाम से।
आज भी वहां पागल बाबा का बनवाया हुआ
बिहारी जी का एक मंदिर है।...
बोल वृंदावन बिहारी लाल की जय

Tuesday, 6 August 2013

07.08.13


बिहारी जी का एक भक्त उनके दर्शन करने वृंदावन गया - वहाँ उसे उनके दर्शन नहीं हुए। मंदिर में बड़ी भीड़ थी, लोग उससे चिल्ला कर कहते ‘‘अरे ! बिहारी जी सामने ही तो खड़े हैं, पर वह कहता है कि भाई। मेरे को तो नहीं दिख रहे।’’ वो मूर्ति को बिहारी जी मानने को तैयार ही नहीं था, उसके नेत्र प्यासे ही रह जाते इस तरह तीन दिन बीत गए पर उसको दर्शन नहीं हुए। उस भक्त ने ऐसा विचार किया कि सबको दर्शन होते हैं और मुझे नहीं होते, तो मैं बड़ा पापी हूं कि ठाकुर जी दर्शन नहीं देते, मेरे प्रेम में या मेरी साधना में कोई कमी है उनके दर्शन भी नहीं होते अत: इस जीवन की अपेक्षा यमुना जी में डूब जाना चाहिए। ऐसा विचार करके रात्रि के समय वह यमुना जी की तरफ चला, वहां यमुना जी के पास एक कुष्ठ रोगी सोया हुआ था।
उसको भगवान ने स्वप्न में कहा कि अभी यहां पर जो आदमी आएगा उसके तुम पैर पकड़ लेना, उसकी कृपा से तुम्हारा कुष्ठ दूर हो जाएगा। वह कुष्ठ रोगी उठ कर बैठ गया - जैसे ही वह भक्त वहां आया, कुष्ठ रोगी ने उसके पैर पकड़ लिए और कहा कि ‘‘मेरा कुष्ठ दूर करो ।’’ भक्त बोला, ‘‘अरे ! मैं तो बड़ा पापी हूं, ठाकुर जी मुझे दर्शन भी नहीं देते। बहुत प्रयास किया,’’ परन्तु कुष्ठ रोगी ने उसको छोड़ा नहीं, अंत में कुष्ठ रोगी ने कहा कि अच्छा तुम इतना कह दो कि तुम्हारा कुष्ठ दूर हो जाए। वह बोला कि इतनी हमारे में योग्यता ही नहीं, कुष्ठ रोगी ने जब बहुत आग्रह किया तब उसने कह दिया कि ‘तुम्हारा कुष्ठ दूर हो जाए।’ ऐसा कहते ही क्षणमात्र में उसका कुष्ठ दूर हो गया। तब उसने स्वप्न की बात भक्त को सुना दी कि भगवान ने ही स्वप्न में मुझे ऐसा करने के लिए कहा था। यह सुनकर भक्त ने सोचा कि आज नहीं मरूंगा, मैं अपने बिहारी जी से फिर मिलने जाऊंगा । जैसे ही वो लौटने के लिए पीछे घूमा तो सीढियों पर ठाकुर जी खड़े थे। उसने ठाकुर जी ने पूछा, ‘‘महाराज ! पहले आपने दर्शन क्यों नहीं दिए ?’’ ठाकुर जी ने कहा कि तुमने उम्र भर मेरे सामने कोई मांग नहीं रखी, मुझ से कुछ चाहा नहीं, अत: मैं तुम्हें मुंह दिखाने लायक नहीं रहा। अब तुमने कह दिया कि इसका कुष्ठ दूर कर दो तो अब मैं मुंह दिखाने लायक हो
गया। इसका क्या अर्थ हुआ ? यही कि जो कुछ भी नहीं चाहता, भगवान उसके दास हो जाते हैं। हनुमान जी ने भगवान का कार्य किया तो भगवान उनके दास हो गए। सेवा करने वाला बड़ा हो जाता है और सेवा कराने वाला छोटा हो जाता है परन्तु भगवान और उनके प्यारे भक्तों को छोटे होने में शर्म नहीं आती। वे जान करके छोटे होते हैं, छोटे बनने पर भी वास्तव में वे छोटे होते ही नहीं और उनमें बड़प्पन का अभिमान होता ही नहीं - मित्रो मैं थोड़े में अधिक कहना चाहता हूँ लेकिन प्रेमाश्रुओ के कारण शब्द इधर उधर भाग गए है . . . . . . प्रभु की कृपा सब पर बनी रहे

Monday, 5 August 2013

06.08.13


एक राजा था, एक बार उसने भगवानकृष्ण जी का एक मंदिर बनवाया और पूजा के लिए एक पुजारी जी को लगा दिया.पुजारी जी बड़े भाव से बिहारी जी की सेवा करने लगे,
भगवान का श्रंगार करते, भोग लगाते, उन्हें सुलाते,ऐसा करते-करते पुजारी जी बूंढे हो गए,
राजा रोज एक फूलो की माला सेवक के हाथ से भेजा करता था,
पुजारी जी वह माला बिहारी जी को पहना देते थे,
जब राजा दर्शन करने जाते थे तो पुजारी जी वह माला बिहारी जी के गले से उतार कर राजा को पहना देते थे.ये हर दिन का नियम था.
एक दिन राजा किसी काम से मंदिर नहीं जा सके इसलिए उसने सेवक से कहा-तुम ये माला लेकर मंदिर जाओ और पुजारी जी से कहना आज हमें कुछ काम है इसलिए हम नही आ सकते वे हमारा इंतजार न करे.सेवक ने जाकर माला पुजारी जी को दे दी और सारी बात बता कर वापस आ गया .पुजारी जी ने माला बिहारी जी को पहना दी फ़िर वे सोचने लगे की आज बिहारीजी की मुझ पर बड़ी कृपा है.राजा तो आज आये नहीं क्यों न ये माला में पहन लू ,
इतना सोचकर पुजारी जी ने माला उतार कर स्वंय पहन ली .
इतने में सेवक ने बाहर से कहा-राजा आ रहे है.
पुजारे जी ने सोचा अगर राजा ने माला मेरे गलेमें देखली, तो मुझ पर बहुत नाराज होगे हड़बडा़हट में पुजारी जी ने अपने गले से माला उत्तार कर बिहारी जी को पहना दी,जैसे ही राजा आये तो माला उतार कर राजा को पहना दी.

राजा ने देखा माला में एक सफ़ेद बाल लगा है तो राजा समझ गए की पुजारी जी ने माला स्वंय पहन ली हैराजा को बहुत गुस्सा आया.
राजा ने पुजारी जी से पूँछा -पुजारी जी ये सफ़ेद बाल किसका है ?
पुजारी जी को लगा अगर में सच बोलूगा तो राजा सजा देगा इसलिये पुजारी जी ने कहा-
ये सफ़ेद बाल बिहारी जी का है.अब तो राजा को और भी गुस्सा आया कि ये पुजारी जी झूठ पर झूठ बोले जा रहा है.बिहारीजी के बाल भी कही सफ़ेद होते है.
राजा ने कहा - पुजारी जी अगर ये सफेद बाल बिहारी जी का है तो सुबह श्रंगार करते, समय में आँउगा और देखूँगा कि बिहारी जी के बाल सफ़ेद है या काले, अगर बिहारी जी के बाल काले निकले तो आपको फाँसी की सजा दी जायेगे.

इतना कह कर राजा चला गया .अब पुजारी जी रोने लगे और बिहारी जी से कहने लगे –
हेप्रभु अब आप ही बचाइए नहीं तो राजा मुझे सुबह होते ही फाँसी पर चढा देगा,
पुजारी जी की सारी रात रोने मेंनिकल गयी कब सुबह हो गयी उन्हें पता ही नहीं चला.
सुबह होते ही राजा आ गया और बोला पुजारी जी में स्वंय देखूगा.
इतना कहकर राजा ने जैसे ही मुकुट हटाया तो क्या देखता है बिहारी जी के सारे बाल सफ़ेद है.
राजा को लगा, पुजारी जी ने ऐसा किया है अब तो उसे और भी गुस्सा आया और उसने परीक्षा करने के लिए कि बाल असली है या नकली,जैसे ही एक बाल तोडा़ तो बिहारी जी के सिर से खून कि धार बहने लगी और बिहारी जी के श्री विग्रह से आवाज आई कि-
हे राजा तुमने आज तक मुझ केवल एक मूर्ति ही समझा इसलिए आज से में तुम्हारे लिए मूर्ति ही हूँ...पुजारी जी तो मुझे साक्षात भगवान् ही समझते हैं !!! ये उनकी श्रद्धा ही है की मेरे बाल मुझे सफेद करने पढ़े व् रक्त की धार भी बहानी पढ़ी तुझे समझाने के लिए !!
और पुजारी जी की सच्ची भक्ति से भगवान बड़े प्रसन्न हुए.

सार-- मंदिर में बैठे भगवान केवल एक पत्थर की मूर्ति नहीं है, उन्हें इसी भाव से देखो की वे साक्षात बिहारी जी है और वैसे ही उनकी सेवा करो.

"जय जय श्री राधे"

Sunday, 4 August 2013

05.08.13


पुराने जमाने में एक राजा जंगल से गुजर रहा था, मार्ग में उसे अत्यन्त धीमी गति से रेंगता एक सांप दिखा । राजा ने यह सोचते हुए कि कहीं ये मेरे रथ से कुचलकर मर न जावे अपना रथ रुकवाकर अपने भाले से यथासंभव सुरक्षित तरीके से उस सांप को उठाकर वृक्ष की ओर उछाल दिया और आगे निकल गया । उस राजा को यह नहीं मालूम पडा कि वह सांप उसके उछाले गये वेग से किसी ऐसी कंटीली झाडी में जाकर फंस गया जहाँ से वह स्वयं के बूते बाहर नहीं निकल पाया और कई दिनों तक उस झाडी में ही लुहूलुहान अवस्था में फंसा रहकर भूखा-प्यासा तडप-तडपकर दर्दनाक तरीके से मृत्यु के मुख में समा गया ।

अगले जन्म में उसी राजा ने भीष्म के रुप में जन्म लिया और पूर्ण न्यायप्रिय और निष्पक्ष जीवन जीने के कारण भीष्म पितामह की पदवी प्राप्त की । किन्तु महाभारत के युद्ध में उन्हीं भीष्म पितामह को बाणों की ऐसी सेज मिली जिसमें तत्काल उनके प्राण भी नहीं निकले और कई दिनों तक बाणों की सेज पर पडे रहने के बाद उसी कंटीली चुभन को भोगते-भोगते मृत्यु के मुख में समाना पडा ।

शास्त्रोक्त मान्यता यह है कि उस सेज-शय्या पर पडे-पडे उनका ईश्वर से भी साक्षात्कार हुआ और जब उन्होंने ईश्वर से यह पूछा कि भगवन मैंने तो अपने जीवन में कोई गलत कार्य नहीं किया, न ही किसी गलत कार्य को होता 
देखकर अपनी ओर से उसे कोई समर्थन दिया फिर मेरा अंत इस प्रकार क्यों हो रहा है ? तब ईश्वर ने उसे याद दिलाया कि पूर्व-जन्म में अपने रथ-मार्ग में आने वाले एक सांप का जीवन बचाने की चाह में आपने उसे अपने भाले से उछालकर झाडियों की ओर फेंका था जहाँ कंटीली झाडियों में फंसकर उस सांप की ऐसी ही मृत्यु हुई थी और ये उसीका परिणाम है जो इस रुप में आपको भोगना पड रहा है ।

तो कथासार यही है कि जब भी हम कोई भला कार्य़ कर रहे हों तो वहाँ भी यह ध्यान अवश्य रखने का प्रयास करें कि नेपथ्य में इसके कारण कुछ ऐसे गलत को तो मेरे द्वारा समर्थन नहीं पहुँच रहा है जो नहीं पहुंचना चाहिये ।

Saturday, 3 August 2013

04.08.13


नदी के तट पर एक संत रहते थे, किसी कंपनी का एक अधिकारी संत के पास पहुंचा। संत नदी के किनारे रेत पर टहल रहे थे - अधिकारी बोला - मैं सिगरेट छोड़ना चाहता हूं, लेकिन छोड़ ही नहीं पाता। कभी दफ्तर में मीटिंग लंबी हो जाती है, तो बिना सिगरेट बुरा हाल हो जाता है। मैं क्या करूं ? संत मुस्कुराए, बोले - जब मैं बच्चा था, तो मुझे रंग-बिरंगे पत्थर बहुत आकर्षित करते थे। कहीं भी कोई पत्थर मिल जाता, तो उसे छोड़ता नहीं था। एक दिन मैं अपने दोस्तों के साथ नदी के तट पर आ गया, यहां अनगिनत रंग-बिरंगे पत्थरों को देखकर मैं खुशी से पागल हो गया। उन्हें समेटने लगा, अपने थैले में मैंने इतने पत्थर भर लिए कि मैं उन्हें उठा भी नहीं सकता था। लेकिन मेरे दोस्तों को पत्थरों से कोई मतलब नहीं था, वे पत्थरों को छोड़कर चले गए। उस दिन मुझे महसूस हो रहा था कि मेरे दोस्त कितने त्यागी हैं। लेकिन पत्थर सिर्फ मेरे लिए मूल्यवान थे, उनके लिए फालतू। बड़े होने पर समझ में आया कि पत्थरों का कोई मूल्य नहीं। अब मैं परमात्मा का चिंतन नहीं छोड़ पा रहा हूं, अधिकारी बोला, मैं कुछ समझा नहीं। संत बोले, जिस दिन तुम नशे को अर्थहीन समझने लगोगे, उसी दिन सिगरेट अपने आप छूट जाएगी । सार इतना सा ही है कि "बुरी चीजों को छोड़ना तब आसान हो जाता है, जब उन्हें अपने लिए अर्थहीन मान लिया जाए" . . . . . . . . . सुप्रभात मित्रो . . . . . . . . जय हो द्वारिकाधीश की

Friday, 2 August 2013

03.08.13


श्री हनुमान-स्तुति

श्री हनुमान जी की स्तुति जिसमें उनके बारह नामों का उल्लेख मिलता है इस प्रकार है :

हनुमानद्द्रजनीसूनुर्वायुपुत्रो महाबलः।

... रामेष्टः फाल्गुनसखः पिङ्गाक्षोऽमितविक्रमः॥

उदधिक्रमणश्चैव सीताशोकविनाशनः।

लक्ष्मणप्राणदाता च दशग्रीवस्य दर्पहा॥

एवं द्वादश नामानि कपीन्द्रस्य महात्मनः। स्वापकाले प्रबोधे च यात्राकाले च यः पठेत्‌॥

तस्य सर्वभयं नास्ति रणे च विजयी भवेत्‌।

(आनंद रामायण 8/3/8-11)

उनका एक नाम तो हनुमान है ही, दूसरा अंजनी सूनु, तीसरा वायुपुत्र, चौथा महाबल, पांचवां रामेष्ट (राम जी के प्रिय), छठा फाल्गुनसख (अर्जुन के मित्र), सातवां पिंगाक्ष (भूरे नेत्र वाले) आठवां अमितविक्रम, नौवां उदधिक्रमण (समुद्र को लांघने वाले), दसवां सीताशोकविनाशन (सीताजी के शोक को नाश करने वाले), ग्यारहवां लक्ष्मणप्राणदाता (लक्ष्मण को संजीवनी बूटी द्वारा जीवित करने वाले) और बारहवां नाम है- दशग्रीवदर्पहा (रावण के घमंड को चूर करने वाले) ये बारह नाम श्री हनुमानजी के गुणों के द्योतक हैं। श्रीराम और सीता के प्रति जो सेवा कार्य उनके द्वारा हुए हैं, ये सभी नाम उनके परिचायक हैं और यही श्री हनुमान की स्तुति है। इन नामों का जो रात्रि में सोने के समय या प्रातःकाल उठने पर अथवा यात्रारम्भ के समय पाठ करता है, उस व्यक्ति के सभी भय दूर हो जाते हैं।

Thursday, 1 August 2013

02.08.13


श्रीकृष्ण ने भी अपने जीवन में ऐसा कौन सा दुःख है जो नहीं देखा ! दुष्टों के
कारागृह में जन्म हुआ, जन्म के तुरन्त बाद उस सुकोमल अवस्था में यमुनाजी की
भयंकर बाढ़ वह उफनती लहरों के बीच टोकरी में छिपाकर पराये घर में ले जाकर रख
दिया गया। राजघराने के लड़के होने के बावजूद गौएँ चराकर रहना पड़ा, चोरी करके
मक्खन-मिश्री खाना पड़ा। कभी पूतना राक्षसी पयःपान में छुपा कर जहर पिलाने आ
गई तो कभी कोई दैत्य छकड़े से दबाने या आँधी में उड़ाने चला आया। कभी बछड़े
में से राक्षस निकल आया तो कभी विशाल गोवर्धन पर्वत को हाथ पर उठाकर खड़े रहना
पड़ा। अपने सगे मामा कंस के कई षड्यंत्रों का सामना करना पड़ा और अंत में उसे
अपने हाथों से ही मारना पड़ा। उनके माँ-बाप को भी जेल के दारूण सुख सहने पड़े।
जरासन्ध से युद्ध के दौरान जब श्रीकृष्ण द्वारका की ओर भागे तो पाँव में न तो
पादुका थी और न ही सिर पर पगड़ी थी। केवल पीताम्बर ओढ़े नंगे पाँव भाग-भाग कर

पहाड़ों में छिपते-छिपाते, सुरक्षित निवास के लिए कई स्थानों को ढूँढते-ढूँढते
अन्त में समुद्र के बीच में जाकर बस्ती बसाना पड़ा। उनके पारिवारिक जीवन में
भी कई विघ्न-बाधाएँ आती रहीं। बड़े भाई बलरामजी को मणि को लेकर श्रीकृष्ण पर
अविश्वास हो गया था। पत्नियों में भी आये दिन ईर्ष्या-जलन व झगड़े-टंटे चलते
ही रहते थे। बाल-बच्चों एवं पौत्रों में से कोई भी आज्ञाकारी नहीं निकला। एक
ओर, जहाँ श्री कृष्ण साधु-संतों का इतना आदर-सत्कार किया करते थे वहीं पर उनके
पुत्र-पौत्र संत-पुरुषों का मखौल उड़ाया करते थे। और भी अनेकाअनेक विकट
परिस्थितियाँ उनके कदम-कदम पर आती रहीं लेकिन श्रीकृष्ण हरदम मुस्कराते रहे और
प्रतिकूलताओं का सदुपयोग करने की कला अपने भक्तों को सिखलाते गये।

मुस्कुराकर गम का जहर जिनको पीना आ गया।

यह हकीकत है कि जहाँ में उनको जीना आ गया..