Friday, 21 June 2013

22.06.13


तुलसी और शालिग्राम
भगवती श्री तुलसी जी से जुड़ी एक कथा बहुत
प्रचलित है। श्रीमद देवि भागवत पुराण में इनके
अवतरण की दिव्य लीला कथा भी बनाई गई है।
एक बार शिव ने अपने तेज को समुद्र में फैंक
दिया था। उससे एक महातेजस्वी बालक ने जन्म
लिया। यह बालक आगे चलकर जालंधर के नाम से
पराक्रमी दैत्य राजा बना।
इसकी राजधानी का नाम जालंधर नगरी था।
दैत्यराज कालनेमी की कन्या वृंदा का विवाह
जालंधर से हुआ। जालंधर महाराक्षस था।
अपनी सत्ता के मद में चूर उसने
माता लक्ष्मी को पाने की कामना से युद्ध किया,
परंतु समुद्र से ही उत्पन्न होने के कारण
माता लक्ष्मी ने उसे अपने भाई के रूप में स्वीकार
किया। वहां से पराजित होकर वह 
देवि पार्वती को पाने की लालसा से कैलाश पर्वत
पर गया।भगवान देवाधिदेव शिव का ही रूप धर
कर माता पार्वती के समीप गया, परंतु मां ने
अपने योगबल से उसे तुरंत पहचान
लिया तथा वहां से अंतध्यान हो गईं।
देवि पार्वती ने क्रुद्ध होकर सारा वृतांत भगवान
विष्णु को सुनाया। जालंधर
की पत्नी वृंदा अत्यन्त पतिव्रता स्त्री थी।
उसी के पतिव्रत धर्म की शक्ति से जालंधर न
तो मारा जाता था और न ही पराजित होता था।
इसीलिए जालंधर का नाश करने के लिए वृंदा के
पतिव्रत धर्म को भंग करना बहुत ज़रूरी था।
इसी कारण भगवान विष्णु ऋषि का वेश धारण
कर वन में जा पहुंचे, जहां वृंदा अकेली भ्रमण कर
रही थीं। भगवान के साथ दो मायावी राक्षस
भी थे, जिन्हें देखकर वृंदा भयभीत हो गईं।
ऋषि ने वृंदा के सामने पल में दोनों को भस्म कर
दिया। उनकी शक्ति देखकर वृंदा ने कैलाश पर्वत
पर महादेव के साथ युद्ध कर रहे अपने
पति जालंधर के बारे में पूछा।
ऋषि ने अपने माया जाल से दो वानर प्रकट
किए। एक वानर के हाथ में जालंधर का सिर
था तथा दूसरे के हाथ में धड़। अपने पति की यह
दशा देखकर वृंदा मूर्चिछत हो कर गिर पड़ीं।
होश में आने पर उन्होंने ऋषि रूपी भगवान से
विनती की कि वह उसके पति को जीवित करें।
भगवान ने अपनी माया से पुन: जालंधर का सिर
धड़ से जोड़ दिया, परंतु स्वयं भी वह उसी शरीर
में प्रवेश कर गए। वृंदा को इस छल
का ज़रा आभास न हुआ। जालंधर बने भगवान के
साथ वृंदा पतिव्रता का व्यवहार करने लगी,
जिससे उसका सतीत्व भंग हो गया। ऐसा होते
ही वृंदा का पति जालंधर युद्ध में हार गया।
इस सारी लीला का जब वृंदा को पता चला,
तो उसने क्रुद्ध होकर भगवान विष्णु
को शिला होने का श्राप दे दिया तथा स्वयं
सति हो गईं। जहां वृंदा भस्म हुईं,
वहां तुलसी का पौधा उगा। भगवान विष्णु ने
वृंदा से कहा, ‘हे वृंदा। तुम अपने सतीत्व के
कारण मुझे लक्ष्मी से भी अधिक प्रिय हो गई
हो। अब तुम तुलसी के रूप में सदा मेरे साथ
रहोगी। जो मनुष्य भी मेरे शालिग्राम रूप के साथ
तुलसी का विवाह करेगा उसे इस लोक और
परलोक में विपुल यश प्राप्त होगा।’
जिस घर में तुलसी होती हैं, वहां यम के दूत
भी असमय नहीं जा सकते। गंगा व नर्मदा के जल
में स्नान तथा तुलसी का पूजन बराबर
माना जाता है। चाहे मनुष्य
कितना भी पापी क्यों न हो, मृत्यु के समय
जिसके प्राण मंजरी रहित तुलसी और गंगा जल
मुख में रखकर निकल जाते हैं, वह पापों से मुक्त
होकर वैकुंठ धाम को प्राप्त होता है। जो मनुष्य
तुलसी व आवलों की छाया में अपने
पितरों का श्राद्ध करता है, उसके पितर मोक्ष
को प्राप्त हो जाते हैं।

Thursday, 20 June 2013

21.06.13


एक बार एक किसान परमात्मा से बड़ा नाराज हो गया ! कभी बाढ़ आ जाये, कभी सूखा पड़ जाए, कभी धूप बहुत तेज हो जाए तो कभी ओले पड़ जाये! हर बार कुछ ना कुछ कारण से उसकी फसल थोड़ी ख़राब हो जाये!एक दिन बड़ा तंग आ करउसने परमात्मा से कहा ,देखिये प्रभु,आपपरमात्मा हैं , लेकिनलगता है आपको खेती बाड़ी की ज्यादा जानकारी नहीं है ,एक प्रार्थना है कि एक साल मुझे मौका दीजिये , जैसा मै चाहू वैसा मौसम हो,फिर आप देखना मै कैसे अन्न के भण्डार भर दूंगा! परमात्मा मुस्कुराये और कहा ठीक है, जैसा तुम कहोगे वैसा ही मौसम दूंगा, मै दखल नहीं करूँगा!
किसान ने गेहूं की फ़सल बोई ,जब धूप चाही ,तब धूप मिली, जब पानी तब पानी ! तेजधूप, ओले,बाढ़ ,आंधी तो उसने आने ही नहीं दी, समय के साथ फसल बढ़ी और किसान की ख़ुशी भी,क्योंकि ऐसी फसल तो आज तक नहीं हुई थी ! किसान ने मन ही मन सोचा अब पता चलेगा परमात्मा को, की फ़सल कैसे करते हैं ,बेकार ही इतने बरस हम किसानो को परेशान करते रहे.
फ़सल काटने का समय भीआया ,किसान बड़े गर्वसे फ़सल काटने गया, लेकिन जैसे ही फसल काटने लगा ,एकदम से छाती पर हाथ रख कर बैठ गया! गेहूं की एकभी बाली के अन्दर गेहूं नहीं था ,सारी बालियाँ अन्दर से खाली थी, बड़ा दुखी होकर उसने परमात्मा से कहा ,प्रभु ये क्या हुआ ?
तब परमात्मा बोले,” ये तो होना ही था ,तुमने पौधों को संघर्ष का ज़रा सा भी मौका नहीं दिया . ना तेज धूप में उनको तपने दिया , ना आंधी ओलों से जूझने दिया,उनको किसी प्रकार की चुनौती का अहसास जरा भी नहीं होने दिया , इसीलिए सब पौधे खोखले रह गए, जब आंधी आती है, तेज बारिश होती है ओले गिरते हैं तब पोधा अपने बल से ही खड़ा रहता है, वो अपना अस्तित्व बचाने का संघर्ष करता है और इससंघर्ष से जो बल पैदाहोता है वोही उसे शक्ति देता है ,उर्जादेता है, उसकी जीवटताको उभारता है.सोने कोभी कुंदन बनने के लिएआग में तपने , हथौड़ी से पिटने,गलने जैसी चुनोतियो से गुजरना पड़ता है तभी उसकी स्वर्णिम आभा उभरती है,उसे अनमोल बनाती है !”
उसी तरह जिंदगी में भी अगर संघर्ष ना हो,चुनौती ना हो तो आदमी खोखला ही रह जाता है, उसके अन्दर कोई गुण नहीं आ पाता !ये चुनोतियाँ ही हैंजो आदमी रूपी तलवार को धार देती हैं ,उसे सशक्त और प्रखर बनाती हैं, अगर प्रतिभाशाली बनना हैतो चुनोतियाँ तो स्वीकार करनी ही पड़ेंगी, अन्यथा हम खोखले ही रह जायेंगे. अगर जिंदगी में प्रखर बनना है,प्रतिभाशाली बननाहै ,तो संघर्ष और चुनोतियो का सामना तो करना ही पड़ेगा

Wednesday, 19 June 2013

20.06.13


वनस्पति जगत में पीपल ही एकमात्र ऐसा वृक्ष है जिसमें कीड़े नहीं लगते हैं। यह वृक्ष सर्वाधिक ऑक्सीजन छोड़ता है जिसे आज विज्ञान ने स्वीकार किया है। भगवान बुद्ध को जिस वृक्ष के नीचे तपस्या करने के बाद ज्ञान प्राप्त हुआ था, वह पीपल का पेड़ ही है और श्रीमद् भागवत गीता के दसवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा है कि वृक्षों में श्रेष्ठ पीपल है।
भविष्य पुराण में ही बताया गया है कि शीशम, अर्जुन, जयंती, करवीर, बेल तथा पलाश के वृक्षों को लगाने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है और रोपणकर्ता के तीन जन्मों के सभी पाप नष्ट हो जाते है
सौ वृक्षों का रोपण करना ब्रह्मारूप और हजार वृक्षों का रोपण करने वाला विष्णुरूप बन जाता है। अशोक वृक्ष के बारे में लिखा है कि इसके लगाने से शोक नहीं होता। अशोक वृक्ष को घर में लगाने से अन्य अशुभ वृक्षों का दोष समाप्त हो जाता है। बिल्व वृक्ष को श्रीवृक्ष भी कहते हैं। यह वृक्ष अति शुभ माना गया है। इसमें साक्षात लक्ष्मी का वास होता है तथा दीर्घ आयुष्य प्रदान करता है।
इसी प्रकार वटवृक्ष के बारे में भी विस्तार से शास्त्रों में बताया गया है। वृक्षायुर्वेद में बताया गया है कि जो व्यक्ति दो वटवृक्षों का विधिवत रोपण करता है वह मृत्योपरांत शिवलोक को प्राप्त होता है।
भविष्य पुराण में ही बताया गया है कि वटवृक्षमोक्षप्रद, आम्रवृक्ष अभीष्ट कामनाप्रद, सुपारी का वृक्ष सिद्धप्रद, जामुन वृक्ष धनप्रद, बकुल पाप-नाशक, तिनिश बल-बुद्धिप्रद तथा कदम्ब वृक्ष से विपुल लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।
आंवले का वृक्ष लगाने से अनेक यज्ञों के सदृशपुण्यफल प्राप्त होता है।
गूलर के पेड़ में गुरुदत्त भगवान का वास माना गया है।
पारिजात के वृक्ष के बारे में तो यह बताया गया है कि भगवान श्रीकृष्ण इसे स्वर्ग से लाएथे।
शास्त्रों में बताया गया है कि वृक्षों को काटने वाला गूंगा और अनेक व्याधियों से युक्त होता है। अश्वत्थ (पीपल, वटवृक्ष और श्रीवृक्ष) का छेदन करने वालों को ब्रह्म हत्या का पाप लगता है।
वृक्षों की रक्षा की प्रतिज्ञा लेते है क्या आप सहमत है ...

Tuesday, 18 June 2013

19.06.13


एक समय की बात है , एक बच्चे का जन्म होने वाला था. जन्म से कुछ क्षण पहले उसने भगवान् से पूछा : ” मैं इतना छोटा हूँ, खुद से कुछ कर भी नहीं पाता , भला धरती पर मैं कैसे रहूँगा , कृपया मुझे अपने पास ही रहने दीजिये , मैं कहीं नहीं जाना चाहता.”

भगवान् बोले, ” मेरे पास बहुत से फ़रिश्ते हैं , उन्ही में से एक मैंने तुम्हारे लिए चुन लिया है, वो तुम्हारा ख़याल रखेगा. “

“पर आप मुझे बताइए , यहाँ स्वर्ग में मैं कुछ नहीं करता बस गाता और मुस्कुराता हूँ , मेरे लिए खुश रहने के लिए इतना ही बहुत है.”

” तुम्हारा फ़रिश्ता तुम्हारे लिए गायेगा और हर रोज़ तुम्हारे लिए मुस्कुराएगा भी . और तुम उसका प्रेम महसूस करोगे और खुश रहोगे.”

” और जब वहां लोग मुझसे बात करेंगे तो मैं समझूंगा कैसे , मुझे तो उनकी भाषा नहीं आती ?”

” तुम्हारा फ़रिश्ता तुमसे सबसे मधुर और प्यारे शब्दों में बात करेगा, ऐसे शब्द जो तुमने यहाँ भी नहीं सुने होंगे, और बड़े धैर्य और सावधानी के साथ तुम्हारा फ़रिश्ता तुम्हे बोलना भी सीखाएगा .”

” और जब मुझे आपसे बात करनी हो तो मैं क्या करूँगा?”

” तुम्हारा फ़रिश्ता तुम्हे हाथ जोड़ कर प्रार्थना करना सीखाएगा, और इस तरह तुम मुझसे बात कर सकोगे.”

“मैंने सुना है कि धरती पर बुरे लोग भी होते हैं . उनसे मुझे कौन बचाएगा ?”

” तुम्हारा फ़रिश्ता तुम्हे बचाएगा , भले ही उसकी अपनी जान पर खतरा क्यों ना आ जाये.”

“लेकिन मैं हमेशा दुखी रहूँगा क्योंकि मैं आपको नहीं देख पाऊंगा.”

” तुम इसकी चिंता मत करो ; तुम्हारा फ़रिश्ता हमेशा तुमसे मेरे बारे में बात करेगा और तुम वापस मेरे पास कैसे आ सकते हो बतायेगा.”

उस वक़्त स्वर्ग में असीम शांति थी , पर पृथ्वी से किसी के कराहने की आवाज़ आ रही थी….बच्चा समझ गया कि अब उसे जाना है , और उसने रोते-रोते भगवान् से पूछा ,” हे ईश्वर, अब तो मैं जाने वाला हूँ , कृपया मुझे उस फ़रिश्ते का नाम बता दीजिये ?’

भगवान् बोले, ” फ़रिश्ते के नाम का कोई महत्त्व नहीं है , बस इतना जानो कि तुम उसे “माँ” कह कर पुकारोगे .”

Monday, 17 June 2013

18.06.13


किसी की मृत्यु के बाद गरुड़ पुराण क्यों सुनी जाती है?

हिंदू शास्त्रों के अनुसार जन्म-मृत्यु एक ऐसा चक्र है जो अनवरत चलता रहता है। जीवन के मृत्यु तो आएगी ही। जन्म से मृत्यु तक हमें कई कार्य करने होते हैं। प्राचीन ऋषि-मुनियों और विद्वानों ने कई परंपराएं बनाई गई हैं जिनका पालन करना काफी हद तक अनिवार्य बताया गया है। हमारे जीवन के साथ-साथ मृत्यु के बाद की भी हमसे जुड़ी कुछ परंपराएं होती हैं जिनका पालन हमारे परिवार वालों को करना पड़ता है। इन्हीं परंपराओं में से एक है घर के किसी सदस्य की मृत्यु के बाद गरुड़ पुराण सुनी जाती है। किसी पंडित से से गरुड़ पुराण पढ़वाई जाती है और घर के सभी सदस्य इसका श्रवण करते हैं। परिवार के किसी भी सदस्य की मृत्यु के बाद घर में गरुड़ पुराण सुनने की प्रथा है। इसका सभी के यहां अनिवार्य रूप पालन किया जाता है। गरुड़ पुराण में जन्म-मृत्यु से जुड़े सभी सवालों के जवाब हैं। जिन्हें जानना सभी के लिए आवश्यक है। इसी वजह से मृत्यु के पश्चात सभी को गरुड़ पुराण का ज्ञान दिया जाता है ताकि सभी जीवित लोग जीवन में अच्छा कार्य करें। सभी जानते हैं कि जो जैसा करता है उसे उसका वैसा ही फल मिलता है। यही बात गरुड़ पुराण में बताई गई है। ऐसी मान्यता है कि गरुड़ पुराण के श्रवण से मरने वाले व्यक्ति की आत्मा को शांति मिलती है क्योंकि गरुड़ पुराण पगड़ी आदि रस्मों के दिन तक पढ़ी जाती है। शास्त्रों के अनुसार पगड़ी रस्म तक मरने वाले की आत्मा उसी के घर में निवास करती है और वह भी यह पुराण सुनती है। गरुड़ पुराण श्रवण का धार्मिक महत्व यही है कि मृत व्यक्ति की आत्मा को शांति मिले और उसे मोक्ष मिल सके। गरुड़ पुराण के अनुसार हमारे कर्मों का फल हमें हमारे जीवन में तो मिलता ही है परंतु मरने के बाद भी कार्यों का अच्छा-बुरा फल मिलता है। इसी वजह से इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए घर के किसी सदस्य की मृत्यु के बाद का अवसर निर्धारित किया गया ताकि उस समय हम जन्म-मृत्यु से जुड़े सभी सत्य जान सके और मृत्यु वश बिछडऩे वाले सदस्य का दुख कम हो सके। 

Sunday, 16 June 2013

17.06.13


मरने के बाद सीधे नहीं ले जाया जाता है यमलोक किया जाता है ये सब

कहा जाता है मौत के बाद भी जीवन होता है। मरने के बाद भी हर इंसान को अपने कर्मों का फल भुगतना पड़ता है। लेकिन यह सिर्फ मान्यता है या सच्चाई ये सच तो नहीं जाना जा सकता। मगर हिन्दू धर्म का ग्रंथ गरुड़ पुराण में मौत के बाद के जीवन के बारे में स्पष्ट वर्णन पढऩे को मिलता है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है आात्मा जब एक शरीर छोड़ती है, तो फिर कहीं ओर वह दूसरा शरीर भी धारण करती है। दरअसल गरुड़पुराण के अनुसार मरने के बाद आत्मा एक शरीर से दूसरे शरीर तक की यात्रा में किन-किन घटनाओं से गुजरना पड़ता है, इस बात का रोचक क्या होता है मौत के वक्त- जब किसी जीव की मौत का समय आता है तो उसे दो यमदूत लेने आते हैं। मरने वाला व्यक्ति अगर पुण्यआत्मा हो तो जब उसके प्राण निकलते हैं तो उसे कोई पीड़ा नहीं होती है। लेकिन मरने वाला व्यक्ति बुरा या पाप कर्म करने वाला हो तो उसे बहुत तकलीफ होती है। मौत के बाद आत्मा को यमदूत केवल 24 घंटों के लिए ही ले जाते हैं। पापकर्म करने वाले को पीड़ा देते हुए व अच्छे कर्म करने वाले को सम्मान के साथ यमलोक तक ले जाया जाता है। इन 24 घंटों में उसे पूरे जन्म की घटनाओं में ले जाया जाता है। उसे दिखाया जाता है कि उसने कितने पाप और कितने पुण्य किए हैं। इसके बाद आत्मा को फिर उसी घर में छोड़ दिया जाता है जहां उसने शरीर का त्याग किया था। इसके बाद 13 दिन तक वह आत्मा वहीं उसी घर में रहती है और तेरह दिन के बाद यमलोक तक की यात्रा करती हैं। आत्मा के जन्म- धर्मग्रंथों के अनुसार आत्मा की आठ तरह की दशा होती है, जिसे गति भी कहते हैं। इसे मूलत: दो भागों में बांटा जाता है पहला अगति और दूसरा गति। जिस प्राणी की गति हो जाती है उसे मोक्ष मिलता है जबकि जिन प्राणियों की अगति होती है उन्हें जन्म मिलता है। अगति के चार प्रकार हैं क्षिणोदर्क - अगति में जीव पुन: पुण्यात्मा के रूप में मृत्यु लोक में आता है और संतों सा जीवन जीता है। भूमोदर्क- भूमोदर्क में वह सुखी और ऐश्वर्य से पूर्ण जीवन मिलता है। तृतीय अगति- में नीच या पशु का जीवन मिलता है। चतुर्थ गति में वह कीट, कीड़ों जैसा जीवन पाता है। कैसे जाती है आत्मा यमलोक तक ! यमलोक तक ले जाने के लिए भी अलग-अलग कर्म करने वाली आत्माओं के लिए अलग-अलग मार्ग है। इसके मुख्यरूप से तीन मार्ग माने गए हैं। इस मार्ग से मृत्यु के 13 दिन के बाद आत्मा को यमलोक तक ले जाया जाता है।
ये तीन रास्ते इस प्रकार हैं
अर्चि मार्ग - अर्चि मार्ग ब्रह्मलोक और देवलोक की यात्रा के लिए है।
धूममार्ग-धूममार्ग पितृलोक की यात्रा के लिए है और
उत्पत्ति-विनाश मार्ग -उत्पति व विनाश मार्ग नर्क की यात्रा के लिए है।
 

Saturday, 15 June 2013

16.06.13


प्रेम और भक्ति में हिसाब!

एक पहुंचे हुए सन्यासी का एक शिष्य था, जब भी किसी मंत्र का जाप करने बैठता तो संख्या को खडिया से दीवार पर लिखता जाता। किसी दिन वह लाख तक की संख्या छू लेता किसी दिन हजारों में सीमित हो जाता। उसके गुरु उसका यह कर्म नित्य देखते और मुस्कुरा देते।

एक दिन वे उसे पास के शहर में भिक्षा मांगने ले गये। जब वे थक गये तो लौटते में एक बरगद की छांह बैठे, उसके सामने एक युवा दूधवाली दूध बेच रही थी, जो आता उसे बर्तन में नाप कर देती और गिनकर पैसे रखवाती। वे दोनों ध्यान से उसे देख रहे थे। तभी एक आकर्षक युवक आया और दूधवाली के सामने अपना बर्तन फैला दिया, दूधवाली मुस्कुराई और बिना मापे बहुत सारा दूध उस युवक के बर्तन में डाल दिया, पैसे भी नहीं लिये। गुरु मुस्कुरा दिये, शिष्य हतप्रभ!

उन दोनों के जाने के बाद, वे दोनों भी उठे और अपनी राह चल पडे। चलते चलते शिष्य ने दूधवाली के व्यवहार पर अपनी जिज्ञासा प्रकट की तो गुरु ने उत्तर दिया,

'' प्रेम वत्स, प्रेम! यह प्रेम है, और प्रेम में हिसाब कैसा? उसी प्रकार भक्ति भी प्रेम है, जिससे आप अनन्य प्रेम करते हो, उसके स्मरण में या उसकी पूजा में हिसाब किताब कैसा?'' और गुरु वैसे ही मुस्कुराये व्यंग्य से।

'' समझ गया गुरुवर। मैं समझ गया प्रेम और भक्ति के इस दर्शन को
 ...