Sunday, 7 April 2013

08.04.13


एक छोटे से गाँव में एक गरीब इमानदार ब्राह्मण था! नौकरी के लिए वोह एक सेठ के पास जाता है, सेठ उसकी माली हालत देखके, उसपे तरस खाके नौकरी पर रख लेता है!
वोह ब्राह्मण इमानदारी से अपना काम शुरू कर देता है! पहले तोह उसे साफ़ सफाई का काम दिया गया था
, जिसे उसने बहुत ही अच्छे से निभाया! वोह दिन भर साफ़ सफाई करता और शाम को सोने से पहले अपने कमरे में रखे एक संदूक को एक बार जरुर खोल के देखता! दूकान के बाकी कर्मचारी उसकी इस हरकत को देखते और परेशान रहते की आखिर इसके इस संदूक में ऐसा क्या है जो यह हर दिन खोल के देखता है और बिना कुछ निकाले वापस बंद करके रख देता है?
फिर किताबी ज्ञान देख के उसे सेठ दूकान के हिसाब - किताब का काम भी दे दिया जाता है! जब उसको यह काम मिलता है तोह वोह बहुत बखूबी से सेठ को सूचित करता है की उनका कारोबार पिछले दो सालो से बहुत ही लाभ में जा रहा है लेकिन सेठ को उनके मुनीम द्वारा यह सूचित किया गया था की उनके कपडे के कारोबार में कोई ज्यादा लाभ नहीं हो रहा! सेठ अपने पिछले मुनीम को बुला के पूछता है की उसने क्यों उसको गलत जानकारी दी? मुनीम घप्लेबाज़ था इसीलिए उसके पास इस प्रशन का कोई उत्तर नहीं था! सेठ उसे नौकरी से निकाल देने का फैसला करता है, लेकिन ब्राह्मण के निवेदन पर उसे दुबारा नौकरी पर रख लेता है! लेकिन ब्राह्मण का वेतन उस मुनीम से ज्यादा करके मुनीम को उस गरीब ब्राह्मण की देखरेख में काम करने का आदेश भी देता है! धीरे धीरे समय बीतता है! गरीब ब्राह्मण अब गरीब नहीं रहता! समाज में उसने अपनी एक साफ़ छवि बना के राखी हुई थी! जो भी सेठ की दूकान में आता वही ब्राह्मण की प्रशंसा करके जाता! समय बदलने के साथ साथ ब्राह्मण ने अपने विचार, अपनी आदत और अपना विनम्र स्वभाव नहीं बदला!
लेकिन दूकान से बाकी कर्मचारियों को उससे बड़ी ईष्या थी! वोह धीरे धीरे एक साजिश के तेहत सेठ का कान भरना शुरू कर देते है! और कहते है की वोह दूकान की तिजोरी से पैसे चोरी करके अपने संदूक में रखता है और हर दिन उसे देख के सोता है! सेठ को भी अपने पिछले मुनीम और अपने बाकी कर्मचारियों की बातो पर विश्वास होने लगता है! एक दिन सेठ ब्राह्मण को बुला कर संदूक के बारे में पूछ लेता है! लेकिन ब्राह्मण उसे संदूक के बारे में कुछ भी कहने से साफ़ मना कर देता है! इससे सेठ को और गुस्सा आता है और उस अपने कर्मचारियों के साथ उस ब्राह्मण के कमरे में जाके उसके संदूक का ताला जबरजस्ती तुड़वाता है! उस संदूक से एक पुराणी मैली पोशाक और एक फटा हुआ जूता मिलता है! पूछे जाने पर ब्राह्मण बताता है की यह वही पोशाक है जो वोह पहली बार पहन के सेठ के पास आया था! यह पोशाक मैंने इसीलिए संभाल के रखी, क्युकी मुझे ज़िन्दगी भर कितना भी यश-अपयश मिले लेकिन मैं कभी भी अपने पुराने दिन ना भूल पाऊं! और इससे रख के मैं ये भी याद रखता हूँ की मेरी कल की ज़िन्दगी कैसी थी और सेठ जी के वजह से आज कैसी है, मैं उनका अहसान हमेशा याद रखु! येही वजह है की मैं हर दिन सोने से पहले इसे जरुर देखता था!
यह सब सुनके सेठ ने उसे गले से लगा लिया और कभी भी छोड़ के ना जाने का वादा भी ले लिया!
और बाकी के कर्मचारियों को दुत्कारते हुए नौकरी से निकाल देता है! लेकिन वोह सभी उस ब्राह्मण का पैर पकड़ के रोने लगते है और ब्राह्मण सेठ जी से उनको दुबारा काम पर रख लेने के लिए निवेदन करता है जिसे वोह सेठ मान जाता है!

Saturday, 6 April 2013

07.04.13


_/\_ जय श्रीकृष्ण _/\_

एक दिन एक शिष्य ने गुरु से पूछा, 'गुरुदेव, आपकी दृष्टि में यह संसार क्या है? ' इस पर गुरु ने एक कथा सुनाई।

'एक नगर में एक शीशमहल था। महल की हरेक दीवार पर सैकड़ों शीशे जडे़ हुए थे। एक दिन एक गुस्सैल कुत्ता महल में घुस गया। महल के भीतर उसे सैकड़ों कुत्ते दिखे, जो नाराज और दुखी लग रहे थे। उन्हें देखकर वह उन पर भौंकने लगा। उसे सैकड़ों कुत्ते अपने ऊपर भौंकते दिखने लगे। वह डरकर वहां से भाग गया।

कुछ दूर जाकर उसने मन ही मन सोचा कि इससे बुरी कोई जगह नहीं हो सकती। कुछ दिनों बाद एक अन्य कुत्ता शीशमहल पहुंचा। वह खुशमिजाज और जिंदादिल था। महल में घुसते ही उसे वहां सैकड़ों कुत्ते दुम हिलाकर स्वागत करते दिखे। उसका आत्मविश्वास बढ़ा और उसने खुश होकर सामने देखा तो उसे सैकड़ों कुत्ते खुशी जताते हुए नजर आए। उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। जब वह महल से बाहर आया तो उसने महल को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ स्थान और वहां के अनुभव को अपने जीवन का सबसे बढ़िया अनुभव माना। वहां फिर से आने के संकल्प के साथ वह वहां से रवाना हुआ।'

कथा समाप्त कर गुरु ने शिष्य से कहा, 'संसार भी ऐसा ही शीशमहल है जिसमें व्यक्ति अपने विचारों के अनुरूप ही प्रतिक्रिया पाता है। जो लोग संसार को आनंद का बाजार मानते हैं, वे यहां से हर प्रकार के सुख और आनंद के अनुभव लेकर जाते हैं। जो लोग इसे दुखों का कारागार समझते हैं उनकी झोली में दुख और कटुता के सिवाय कुछ नहीं बचता।'

Friday, 5 April 2013

06.04.13


JAI SHREE RADHE KRISHNA!

एक सेठ अपने बगीचे से बहुत प्रेम करते थे वसंत आते ही उनके बगीचे मे हर तरह के फूलों ने अपनी छटा बिखेर दी सुंदर सुंदर फूलों के बीच जब सेठ जंगली फूलों को देखते तो उदास हो जाते सेठ ने उन जंगली फूलों को उखाड़कर फेंक दिया लेकिन कुछ दिनों बाद वे जंगली फूल फिर उग आए सेठ ने सोचा क्यों न इन पर दवा का प्रयोग किया जाए फिर उन्हें किसी जानकार ने बताया कि इस तरह तो अच्छे फूलों के नष्ट होने का खतरा भी है तब सेठ ने निराश होकर अच्छे अनुभवी माली की सलाह ली माली ने कहा अच्छी चीजों के साथ बुरी चीजें जीवन के अनिवार्य नियमों मे शामिल है जहाँ बहुत सी बातें अच्छी होती है वहाँ कुछ अनचाही दिक्कते और तकलीफ भी पैदा हो जाती है मेरी मानो सेठजी तो तुम इन्हें नजरअंदाज करना सीखों यही खुश होने का सर्वोत्तम उपाय है इन फूलों की तुमने कोई ख्वाहिश तो नही की थी लेकिन अब वेतुम्हारे बगीचे का हिस्सा बन गये है यह जीवन ऐसा ही है इसे स्वीकार करके ही तुम खुश हो सकते हो यदि गुणों का फायदा उठाना चाहते हो तो अवगुणों को बर्दाश्त करना ही होगा..!

Thursday, 4 April 2013

05.04.13


@ जीवन का उद्देश्य @
दूसरो की मदद किये बिना
हम अपनी
मदद नही कर सकते हैं
दूसरो को फायदा पहुचाये बिना
हम खुद को फायदा नही पंहुचा सकते हैं !
दूसरो को खुशहाली दिए बगैर
हम खुद खुशहाल नही हो सकते !!
इसलिए "सीखो ऐसे कि जैसे तुम्हे सदा जीना है, जियो ऐसे कि जैसे तुम्हे कल ही दुनिया से चले जाना है !!

Wednesday, 3 April 2013

04.04.13


गुरु गोविन्द दोउ खड़े काके लागु पाय ;
बलिहारी गुरु आपके जिन गोविन्द दिये मिलाय !
एक बार बारिश के मौसम में कुछ साधू-महात्मा अचानक कबीर जी के घर आ गये !बारिश के कारण कबीर साहब जी बाज़ार में कपडा बेचने नही जा सके और घर पर खाना भी काफी नही था !उन्होंने अपनी पत्नी लोई से पूछा -क्या कोई दुकानदार कुछ आटा -दाल हमें उधार दे देगा जिसे हम बाद में कपडा बेचकर चुका देगे !पर एक गरीब जुलाहे को भला कौन उधार देता जिसकी कोई अपनी निश्चित आय भी नही थी !
लोई कुछ दुकानो पर सामान लेने गई पर सभी ने नकद पैसे मांगे आखिर एक दुकानदार ने उधार देने के लिये उनके सामने एक शर्त रखी कि अगर वह एक रात उसके साथ बितायेगी तो वह उधार दे सकता है !इस शर्त पर लोई को बहुत बुरा तो लगा लेकिन वह खामोश रही जितना आटा-दाल उन्हें चाहिये था दुकानदार ने दे दिया !जल्दी से घर आकर लोई ने खाना बनाया और जो दुकानदार से बात हुई थी कबीर साहब को बता दी !
रात होने पर कबीर साहब ने लोई से कहा कि दुकानदार का क़र्ज़ चुकाने का समय आ गया है ; चिंता मत करना सब ठीक हो जायेगा !जब वह तैयार हो कर जाने लगी कबीर जी बोले क़ि बारिश हो रही है और गली कीचड़ से भरी है तुम कम्बल ओढ़ लो मै तुमे कंधे पर उठाकर ले चलता हूँ !
जब दोनों दुकानदार के घर पर पहुचे लोई अन्दर चली और कबीर जी दरवाजे के बाहर उनका इंतज़ार करने लगे !लोई को देखकर दुकानदार बहुत खुश हुआ पर जब उसने देखा कि बारिश के बावजूद न तो लोई के कपडे भीगे है ओर ना ही पाँव तो उसे बहुत हैरानी हुई !उसने पूछा -यह क्या बात है क़ि कीचड़ से भरी गली में से तुम आई हो फिर भी तुमारे पावो पर कीचड़ का एक दाग भी नही !
तब लोई ने जवाब दिया -इसमें हैरानी की कोई बात नही मेरे पति मुझे कम्बल ओढा कर अपने कंधे पर बिठाकर यहाँ पर लाये है !यह सुनकर दूकानदार बहुत चकित रह गया ;लोई का निर्मल और निष्पाप चेहरा देखकर वह बहुत प्रभावित हुआ और आश्चर्य से उसे देखता रहा !जब लोई ने कहा कि उसके पति कबीर साहब जी उसे वापस ले जाने के लिये बाहर इंतज़ार कर रहे है तो दुकानदार अपनी नीचता और कबीर साहब जी की महानता को देख-देख कर शर्म से पानी-पानी हो गया !
उसने लोई और कबीर साहब जी दोनों से घुटने टेक कर क्षमा मांगी !कबीर साहब जी ने उसको क्षमा कर दिया !दुकानदार कबीर जी के दिखाये हुए मार्ग पर चल पड़ा जो कि था परमार्थ का मार्ग और समय के साथ उनके प्रेमी भक्तो में गिना जाना लगा ;भटके हुए जीवो को सही रास्ते पर लाने के लिए संतो के अपने ही तरीके होते है !
संत ने छोड़े संतई चाहे कोटिक मिले असंत ;
चन्दन विष व्यामत नही लिपटे रहत भुजंग !
पूर्ण संत हर काल में हर किसी की मन की मैल और विकारो को मिटाकर एवं प्रभु का ज्ञान करवाकर प्रभु की कृपादर्ष्टि का पात्र बनाता है !

Tuesday, 2 April 2013

03.04.13


रेगिस्तान में एक आदमी के पास यमदूत आया लेकिन आदमी उसे पहचान नहीं सका और उसने उसे पानी पिलाया.

“मैं मृत्युलोक से तुम्हारे प्राण लेने आया हूँ” – यमदूत ने कहा – “लेकिन तुम अच्छे आदमी लगते हो इसलिए मैं तुम्हें पांच मिनट के लिए नियति की पुस्तक दे सकता हूँ. इतने समय में तुम जो कुछ बदलना चाहो, बदल सकते हो”.

यमदूत ने उसे नियति की पुस्तक दे दी. पुस्तक के पन्ने पलटते हुए आदमी को उसमें अपने पड़ोसियों के जीवन की झलकियाँ दिखीं. उनका खुशहाल जीवन देखकर वह ईर्ष्या और क्रोध से भर गया.

“ये लोग इतने अच्छे जीवन के हक़दार नहीं हैं” – उसने कहा, और कलम लेकर उनके भावी जीवन में भरपूर बिगाड़ कर दिया.

अंत में वह अपने जीवन के पन्नों तक भी पहुंचा. उसे अपनी मौत अगले ही पल आती दिखी. इससे पहले कि वह अपने जीवन में कोई फेरबदल कर पाता, मौत ने उसे अपने आगोश में ले लिया.

अपने जीवन के पन्नों तक पहुँचते-पहुँचते उसे मिले पांच मिनट पूरे हो चुके थे.

Monday, 1 April 2013

02.04.13


हे दुःख भन्जन, मारुती नंदन, सुन
लो मेरी पुकार |
पवनसुत विनती बारम्बार ||
अष्ट सिद्धि नव निद्दी के दाता, दुखिओं के
तुम भाग्यविदाता |
सियाराम के काज सवारे, मेरा करो उधार
||
अपरम्पार है शक्ति तुम्हारी, तुम पर रीझे
अवधबिहारी |
भक्ति भाव से ध्याऊं तुम्हे, कर दुखों से पार
||
जपूं निरंतर नाम तिहरा, अब नहीं छोडूं
तेरा द्वारा |
राम भक्त मोहे शरण मे लीजे भाव सागर से
तार |