Wednesday, 13 March 2013

14.03.13


एक बार अर्जुन को अहंकार हो गया कि वही भगवान के सबसे बड़े भक्त हैं। उनको श्रीकृष्ण ने समझ लिया। एक दिन वह अर्जुन को अपने साथ घुमाने ले गए।

रास्ते में उनकी मुलाकात एक गरीब ब्राह्मण से हुई। उसका व्यवहार थोड़ा विचित्र था। वह सूखी घास खा रहा था और उसकी कमर से तलवार लटक रही थी।

अर्जुन ने उससे पूछा, ‘आप तो अहिंसा के पुजारी हैं। जीव हिंसा के भय से सूखी घास खाकर अपना गुजारा करते हैं। लेकिन फिर हिंसा का यह उपकरण तलवार क्यों आपके साथ है?’

ब्राह्मण ने जवाब दिया, ‘मैं कुछ लोगों को दंडित करना चाहता हूं।’

‘ आपके शत्रु कौन हैं?’ अर्जुन ने जिज्ञासा जाहिर की।

ब्राह्मण ने कहा, ‘मैं चार लोगों को खोज रहा हूं, ताकि उनसे अपना हिसाब चुकता कर सकूं।

सबसे पहले तो मुझे नारद की तलाश है। नारद मेरे प्रभु को आराम नहीं करने देते, सदा भजन-कीर्तन कर उन्हें जागृत रखते हैं।

फिर मैं द्रौपदी पर भी बहुत क्रोधित हूं। उसने मेरे प्रभु को ठीक उसी समय पुकारा, जब वह भोजन करने बैठे थे। उन्हें तत्काल खाना छोड़ पांडवों को दुर्वासा ऋषि के शाप से बचाने जाना पड़ा। उसकी धृष्टता तो देखिए। उसने मेरे भगवान को जूठा खाना खिलाया।’

‘ आपका तीसरा शत्रु कौन है?’ अर्जुन ने पूछा। ‘

वह है हृदयहीन प्रह्लाद। उस निर्दयी ने मेरे प्रभु को गरम तेल के कड़ाह में प्रविष्ट कराया, हाथी के पैरों तले कुचलवाया और अंत में खंभे से प्रकट होने के लिए विवश किया।

और चौथा शत्रु है अर्जुन। उसकी दुष्टता देखिए। उसने मेरे भगवान को अपना सारथी बना डाला। उसे भगवानकी असुविधा का तनिक भी ध्यान नहीं रहा। कितना कष्ट हुआ होगा मेरे प्रभु को।’ यह कहते ही ब्राह्मण की आंखों में आंसू आ गए।

यह देख अर्जुन का घमंड चूर-चूर हो गया। उसने श्रीकृष्ण से क्षमा मांगते हुए कहा, ‘मान गया प्रभु, इस संसार में न जाने आपके कितने तरह के भक्त हैं। मैं तो कुछ भी नहीं हूं।’जय श्री कृष्ण

Tuesday, 12 March 2013

13.03.13


 मिट्टी ने मटके से पूछा, मैं भी मिट्टी हूं और तू भी, परंतु पानी मुझे बहा ले जाता है और तू पानी को अपने में रोके रखता है। मटका बोला, मैं भी मिट्टी हूं और तू भी मिट्टी है, परंतु पहले मैं पानी में गुंथा, फिर चाक पर चला, तत्पश्चात प्रहार सहे, फिर अग्नि में तपाया गया.। इन सब मार्गो पर चलने के बाद आज मुझमें यह क्षमता आ गई है कि पानी मेरा कुछ भी बिगाड नहीं सकता।

इसी तरह मंदिर की सीढियों के मार्बल ने मूर्ति रूपी मार्बल से पूछा, तू भी मार्बल है और मै भी मार्बल हूं, परंतु लोग तेरी पूजा करते हैं और मुझे पैरों तले रौंदते हैं। ऐसा क्यों? मूर्ति ने उत्तर दिया, तू नहीं जानती मैंने कितनी छेनियों के प्रहार झेले हैं। तू नहीं जानती मुझे कितना घिसा गया है। उसके उपरांत ही आज मैं इस काबिल हो सकी हूं कि लोग मुझे देवता मान बैठे हैं।

इन दोनों काल्पनिक कथाओं में एक अहम संदेश है। संदेश यह है कि तप का कोई भी विकल्प नहीं होता। कोई भी व्यक्ति तप के द्वारा ही ऊंचाई पर पहुंच पाता है। सामान्यतया हम सब के पास दो हाथ, दो पांव, दो आंखें अर्थात एक जैसा ही शरीर होता है, परंतु क्या वजह है कि एक व्यक्ति समाज में सम्माननीय बन जाता है, तो दूसरा निकृष्ट? आत्मबोध ग्रंथ के प्रथम श्लोक में आदि शंकराचार्य ने तपोभिक्षीणपापानां का उल्लेख किया है, जिसका अर्थ है जिसका जीवन तप से पवित्र हो गया है। तप का अर्थ स्वयं को तपाना है। हम मेहनत से ही स्वयं को तपाते हैं। तप का अर्थ है अपने मन और बुद्धि की ऊर्जा को अपने लक्ष्य में लगाना और उस लक्ष्य के मार्ग में जो भी प्रलोभन आएं उनका तिरस्कार करना। कुल मिलाकर यह मानव से महामानव बनने की प्रक्रिया है।

सर्दियों में सुबह चार बजे ठंडे पानी से नहाना तप नहीं है। घर-परिवार छोडकर जंगलों में जाना तप नहीं है। तप है तपना, प्रयास करना, मेहनत करना। एक बच्चा जो परीक्षा की तैयारी कर रहा है, वह भी उसके लिए तप है। एक मां रात-रात भर जागकर अपने बीमार बच्चे की सेवा कर रही है, वह भी तप है। एक व्यक्ति, जो अपने हर काम को बिना किसी प्रलोभन के दत्तचित्त से कर रहा है, वह भी तप है।

एक राजा की कथा है, जिसकी कोई संतान नहीं थी। जब वह बूढा हो गया तो उसे अगले योग्य राजा की खोज के लिए एक उपाय सूझा। उसने मेले का आयोजन किया और घोषणा करवा दी कि मैं इस मेले में छिप जाऊंगा, जो मुझे खोज निकालेगा, वही राजा बनेगा। राजा ने इस मेले में लोभ पैदा करने के लिए जगह-जगह तमाम इंतजाम कर दिए। कहीं मुफ्त में सोने के सिक्के दिए जा रहे थे, तो कहीं अन्य लालच। सब लोग आए थे राजा को खोजने के लिए परंतु सब के सब प्रलोभनों में अटक गए। लेकिन एक युवक राजा की खोज में लगा रहा। उसने आखिरकार राजा को मेले के सबसे आखिरी पडाव पर ढूंढ ही निकाला। जैसे ही युवक ने राजा को खोजा, जिन-जिन प्रलोभनों को उसने पीछे छोडा था, वह उन सबका मालिक बन गया। इसी को कहते हैं तप! जब भी आप अपने लक्ष्य पर चलते हैं, तो रास्ते में प्रलोभन आते हैं। उन प्रलोभनों में अधिकतर लोग फिसल जाते हैं, परंतु जो व्यक्ति उन प्रलोभनों के मौजूद रहते हुए भी उनसे निस्पृह बना रहता है और अपने आपको स्थिर रखकर अपने लक्ष्य के लिए अपने कर्म में निरंतर लगा रहता है, वही है सच्चा तपस्वी, वही है स्थितिप्रज्ञ, वही है योगी। तन, मन और बुद्धि का तप ही आपको साधारण से असाधारण बना देता है .!

खुला मत छोड़ो अपने जख्मों को
मुट्ठी में नमक लिए लोग बैठे हैं..

Monday, 11 March 2013

12.03.13


एक व्यक्ति मंदिर के लिए फूल तोड़ रहा था । कई पेड़ो से कई तरह के फूल एकत्रित किये - उन फूलो के साथ भूलवश कुछ कलिया भी तोड़ दी, फूल तोड़ते समय उसने एक डाली भी तोड़ डाली - अब वो भजन गाता मंदिर को चला गया । बगीचे के पेड़ बड़े क्रुद्ध हुए और एक बुजुर्ग पेड़ से शिकायत की, देखो उस आदमी ने फूल के साथ कलिया और डाली भी तोड़ डाली । बूढ़ा पेड़ मुस्कुराया और बोला - जो उसने किया वो उसका कार्य था और फूल, फल देना हमारा कर्त्तव्य, कभी कभी कर्त्तव्य पथ पर लोग चोटिल भी कर देते है हम फिर भी मुस्कुराते हुए आगे बढ़ते है और पुनः अपना स्वरुप प्राप्त कर लेते है - प्रकृति हमें नयी डालियों और फूलो से लाद देती है इसलिए कभी रुष्ट मत हो कष्ट सहो क्योकि जिसमे देने की सामर्थ्य है वो कभी खाली नहीं होता, इसलिए प्रभु से यही प्रार्थना करना की प्रभु जीवन में हमेशा देने की भावना बनी रहे । सही भी है मित्रो पेड़ ज़िन्दगी भर - फल, फूल, छाव देते है और अपनी मृत्यु के बाद अपनी काया भी समर्पित कर देते है - लेकिन मनुष्य कभी उनसे सीख नहीं पाता बस अपने ही संग्रह में लगा रहता है .

Sunday, 10 March 2013

11.03.13


एक फकीर 50 साल से एक ही जगह बैठकर रोज की 5 नमाज पढता था.

एक दिन आकाशवाणी हुई और खुदा की आवाज आई

"हे फकीर.!
तु 50 साल से नमाज पढ रहा है, लेकिन तेरी एक भी नमाज स्वीकार नही हुई"

फकीर के साथ बैठने वाले दुसरे बंदो को भी दु:ख हुआ कि,

यह बाबा 50 साल से नमाज पढ रहे है और इनकी एक भी नमाज कबुल नही हुई.
...
खुदा यह तेरा कैसा न्याय.?

लेकिन फकीर दु:खी होने के बजाय खुशी से नाचने लगा.

दुसरे लोगो ने फकीर को देखकर आश्चर्य हुआ.

एक बंदा फकीर से बोला : बाबा, आपको तो दु:ख होना चाहिए कि आपकी 50 साल कि बंदगी बेकार गई.!

फकीर ने जवाब दिया : " मेरी 50 साल की बंदगी भले ही कबुल ना हुई तो क्या हुआ...!!! लेकिन खुदा को तो पता है ना कि मैँ 50 साल से बंदगी कर रहा हु"

इसिलिए दोस्तो जब आप मेहनत करते हो और फल ना मिले तो निराश मत होना,

क्युकिँ

भगवान को तो पता है ही कि आप मेहनत कर रहे है, इसिलिए फल तो जरुर देग

Saturday, 9 March 2013

10.03.13


महाशिवरात्रि कल: इस विधि से करें भगवान शिव की पूजा, 
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महाशिवरात्रि(इस बार 10 मार्च, रविवार) के दिन भगवान शिव की पूजा करने से विशेष फल मिलता है। जो व्यक्ति इस दिन भगवान शिव के निमित्त व्रत रखता है उसे अक्षय पुण्य मिलता है। धर्म शास्त्रों में महाशिवरात्रि व्रत के संबंध में विस्तृत उल्लेख है। उसके अनुसार महाशिवरात्रि का व्रत इस प्रकार करें-

शिवपुराण के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन व्रती(व्रत करने वाला) सुबह जल्दी उठकर स्नान संध्या करके मस्तक पर भस्म का त्रिपुण्ड तिलक और गले में रुद्राक्ष की माला धारण कर श्वि मंदिर में जाकर शिवलिंग का विधिपूर्वक पूजन करें। इसके बाद श्रृद्धापूर्वक व्रत का संकल्प इस प्रकार लें-
शिवरात्रिव्रतं ह्येतत् करिष्येहं महाफलम्।
निर्विघ्नमस्तु मे चात्र त्वत्प्रसादाज्जगत्पते।।
यह कहकर हाथ में फूल, चावल व जल लेकर उसे शिवलिंग पर अर्पित करते हुए यह श्लोक बोलें-
देवदेव महादेव नीलकण्ठ नमोस्तु ते।
कर्तुमिच्छाम्यहं देव शिवरात्रिव्रतं तव।।
तव प्रसादाद्देवेश निर्विघ्नेन भवेदिति।
कामाद्या: शत्रवो मां वै पीडां कुर्वन्तु नैव हि।।
रात्रिपूजा
व्रती दिनभर शिवमंत्र (ऊँ नम: शिवाय) का जप करे तथा पूरा दिन निराहार रहे। (रोगी, अशक्त और वृद्ध दिन में फलाहार लेकर रात्रि पूजा कर सकते हैं।) धर्मग्रंथों में रात्रि के चारों प्रहरों की पूजा का विधान है। सायंकाल स्नान करके किसी शिवमंदिर में जाकर अथवा घर पर ही (यदि नर्मदेश्वर या अन्य कोई उत्तम शिवलिंग हो) पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह करके तिलक एवं रुद्राक्ष धारण करके पूजा का संकल्प इस प्रकार लें-
ममाखिलपापक्षयपूर्वकसलाभीष्टसिद्धये शिवप्रीत्यर्थं च शिवपूजनमहं करिष्ये
व्रती को फल, पुष्प, चंदन, बिल्वपत्र, धतूरा, धूप, दीप और नैवेद्य से चारों प्रहर की पूजा करनी चाहिए। दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से अलग-अलग तथा सबको एक साथ मिलाकर पंचामृत से शिव को स्नान कराकर जल से अभिषेक करें। चारों प्रहर के पूजन में शिवपंचाक्षर(नम: शिवाय) मंत्र का जप करें। भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, उग्र, महान्, भीम और ईशान, इन आठ नामों से पुष्प अर्पित कर भगवान की आरती व परिक्रमा करें। अंत में भगवान से प्रार्थना इस प्रकार करें-
नियमो यो महादेव कृतश्चैव त्वदाज्ञया।
विसृत्यते मया स्वामिन् व्रतं जातमनुत्तमम्।।
व्रतेनानेन देवेश यथाशक्तिकृतेन च।
संतुष्टो भव शर्वाद्य कृपां कुरु ममोपरि।।
अगले दिन सुबह पुन: स्नानकर भगवान शंकर की पूजा करके पश्चात व्रत खोलना चाहिए।

10.03.13


एक जंगल में एक संत अपनी कुटिया बनाकर रहते थे,एक किरात ( जानवरों का शिकार करने वाला) रहता था.संत को देखकर हमेशा प्रणाम करता था.ऐसा हमेशा होता था, रोज किरात कुटिया के सामने से निकलता और संत को प्रणाम करता.
एक दिन किरात संत से बोला - बाबा! मै तो मृग का शिकार करने आता हूँ ,आप यहाँ किसका शिकार करने आते हो?
संत बोले - मै श्रीकृष्ण मृग का शिकार करने आता हूँ,इतना कहकर संत रोने लगे.
किरात बोला - बाबा रोते क्यों हो,मुझे बताओ ये कृष्ण देखने में कैसा है ? मैंने कभी इस तरह के शिकार के बारे में नहीं सुना.मै अवश्य ही आपका शिकार आपको लाकर दूँगा, संत ने भगवान का स्वरुप बता दिया,काले रंग का है,मोर का मुकुट लगाता है,बासुरी बजाता है.
किरात बोला - तुम्हारा शिकार हम पकड़कर लाते है,जब तक शिकार हम आपको लाकर नहीं देगे, तब तक पानी भी नहीं पीयेगे,इतना कहकर किरात चला गया. अब तो एक जगह जाल बिछाकर बैठ गया, ३ दिन हो गए किरात के मन में वही संत द्वारा बताई छवि बसी हुई थी,यूँ ही बैठा रहा.
भगवान को दया आ गई और बाल कृष्ण बासुरी बजाते हुए आ गए,और स्वयं ही जाल में फस गए,किरात ने तो कभी देखा नहीं था संत द्वारा बताई,छवि जब आँखों के सामने देखी तो तुरंत चिल्लाने लगा फस गया! फस गया! मिल गया! मिल गया!
अच्छा बच्चू तीन दिन भूखा प्यासा रखा अब हाथ में आये हो! तुरंत ठाकुर जी को जाल में ही फसे हुए अपने कंधे पर शिकार की भांति टांगा और संत की कुटिया की ओर चला,कुटिया के बाहर से ही आवाज लगायी,बाबा जल्दी से बाहर आओ आपका शिकार लेकर आया हूँ.
संत झट कुटिया से बाहर आये तो क्या देखते है किरात के कंधे पर जाल में फसे ठाकुर जी मुस्कुरा रहे है,संत चरणों में गिर पड़ा.

फिर ठाकुर जी से बोला - प्रभु हमने बचपन से घर-बार छोड़ा, अब तक आप नहीं मिले,और इसको तुम ३ दिन में ही मिल गए? ऐसा क्यों ?
भगवान बोले - बाबा !इसने तुम्हारा आश्रय लिया इसलिए इस पर ३ दिन में ही कृपा हो गई.

कहने का अभिप्राय ये है कि भगवान पहले उस पर कृपा करते है जो उनके दासों के चरण पकडे होता है,किरात को पता भी नहीं था भगवान कौन है? कैसे होते है ? पर संत को रोज प्रणाम करता था,संत प्रणाम और दर्शन का फल ये हुआ कि ३ दिन में ही ठाकुर जी मिल गए.


Friday, 8 March 2013

09.03.13


फूलों के लिए सारा जगत फूल है और कांटों के लिए कांटा. जो जैसा है, उसे दूसरे वैसा ही प्रतीत होते हैं. जो स्वयं में नहीं है, उसे दूसरों में देख पाना कैसे संभव है! सुंदर को खोजने के लिए चाहे हम सारी भूमि पर भटक लें, पर यदि वह स्वयं के ही भीतर नहीं है, तो उसे कहीं भी पाना असंभव है.

एक अजनबी किसी गांव में पहुंचा. उसने उस गांव के प्रवेश द्वार पर बैठे एक वृद्ध से पूछा, ”क्या इस गांव के लोग अच्छे और मैत्रिपूर्ण हैं?”

उस वृद्ध ने सीधे उत्तर देने की बजाय स्वयं ही उस अजनबी से प्रश्न किया, ”मित्र, जहां से तुम आते हो वहां के लोग कैसे हैं?”

अजनबी दुखी और क्रुद्ध हो कर बोला, ”अत्यंत क्रूर, दुष्ट और अन्यायी. मेरी सारी विपदाओं के लिए उनके अतिरिक्त और कोई जिम्मेवार नहीं. लेकिन आप यह क्यों पूछ रहे हैं?”

वृद्ध थोड़ी देर चुप रहा और बोला, ”मित्र, मैं दुखी हूं. यहां के लोग भी वैसे ही हैं. तुम उन्हें भी वैसा ही पाओगे.”

वह व्यक्ति जा भी नहीं पाया था कि एक दूसरे राहगीर ने उस वृद्ध से आकर पुन: वही बात पूछी, ”यहां के लोग कैसे हैं?”

वह वृद्ध बोला, ”मित्र क्या पहले तुम बता सकोगे कि जहां से आते हो, वहां के लोग कैसे हैं?”

इस प्रश्न को सुन यह व्यक्ति आनंदपूर्ण स्मृतियों से भर गया. उसकी आंखें खुशी के आंसुओं से गीली हो गई. उसने कहा, ”आह, वे बहुत प्रेमपूर्ण और बहुत दयालू थे. मेरी सारी खुशियों का कारण वे ही थे. काश, मुझे उन्हें कभी भी न छोड़ना पड़ता!”

वृद्ध बोला, ”मित्र, यहां के लोग भी बहुत प्रेमपूर्ण हैं, इन्हें तुम उनसे कम दयालु नहीं पाओगे, ये भी उन जैसे ही हैं. मनुष्य-मनुष्य में बहुत भेद नहीं है.”

संसार दर्पण है. हम दूसरों में जो देखते हैं, वह अपनी ही प्रतिक्रिया होती है. जब तक सभी में शिव और सुंदर के दर्शन न होने लगें, तब तक जानना चाहिए कि स्वयं में ही कोई खोट शेष रह गई है.